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किसी को अनुभव हो तो जरूर बतायें ..

कि

*घर की अलमारी में पति अपने कपड़े रखने के लिये
कितना हिस्सा कानूनन मांग सकता है* ..

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Mirchi Muuh k alaawa or kaha lagti hai?
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Kheton me lagti hai Mere Bhai
Hamesha Apni BUM Ke bare me hi kyu Sochte ho?

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दीपावली पर एक छोटी सी अपील: कृपया पटाखे छोड़े क्यों की ये त्यौहार ही पटाखों का है
रही बात पर्यावरण की एक दीवाली की रात बारूद की महक से सारे मच्छरो और कई कीड़ों का सफाया हो जाता है
सालभर एयर कंडिशन्ड रूम में बैठकर ओजोन लेयर की ऐसी तैसी करने वाले कृपया दीपावली पर आतिशबाजी न करने की सलाह न दें….मिडिया और पर्यावरण के रखवालो को पर्यावरण बचाने की याद सभी हिन्दू त्यौहारो पर ही आती है।
जम के पटाखे छुड़ाइये, दिवाली है,
कोई ” नवाज़ शरीफ” का अंतिम संस्कार नही है जो मातम मनाएं, बाकि के 364 दिन है पर्यावरण के लिए…
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*सभी ज्ञानचंद रायचंद. खामोश रहे।🙄🙄🙄*
बम पटाखे का आनंद लीजिये। …..
इससे डेंगू
चिकनगुनिया के मच्छर मरेंगे यह स्वास्थ्य
वर्धक है …
जिसे प्रदुषण की बहुत
चिंता है …..
वो सबसे पहले अपनी गाडी बेचे और
साइकिल का इस्तेमाल करे !

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औरतें भी बहुत जिद्दी होती हैं

अब आप ही देख लो वीरु के लाख मना करने के बाद भी बसंती उन कुत्तों के सामनें नाची

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🤫🎻

लड़के वाले लड़की देखने उसके घर गये।
लड़की पंसन्द आ गई।

पड़ित बोला 36 के 36 गुण मिल गए है।

लड़के वाले उठके घर चले दिए।

पंडित बोला क्या हुआ

लड़के वाले बोले :- लड़का तो निकम्मा है अब बहु भी निकम्मी लेले क्या !!!!!

:; 🤭🤯

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आखिर कैसे भुला दे हम उन्हें….
मौत इंसानो को आती है यादो को नहीं……!!

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दिल्ली के मेट्रो ट्रेन में एक लडका
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रोजाना बुजुर्ग महिला के लिये
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अपनी सीट खाली कर देता था
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बुढिया भी बडे स्नेह के साथ
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रोज उसे कुछ काजू किशमिश और पिस्ते के टुकड़े
खाने को दिया
करती थी
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लडका खा लेता था
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कई दिनो तक ऐसा ही चलता रहा
.
आखिरकार एक दिन उसने बूढी अम्मा से पूछा
:आप
रोज मुझे ये मेवे क्यो खाने को देती है ।
.
बूढी अम्मा भावुक हो कर
बोली : मुझे केडबरी फ्रूटस एंड नट
बहुत पसंद है ।
.अब दांत तो रहे
नहीं तो चाकलेट चूस लेती हूं ओर
ड्राई फ्रूटस तुम्हे दे देती हूं।
लड़का अभी तक बेहोश है

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एक सयानी सास ने नई-नई आई बहू से पूछा : बहू, मान लो अगर तुम पलंग पर बैठी हो,

और मैं भी उस पर आकर बैठ जाऊं तो तुम क्या करोगी?

बहू : तो मैं उठकर सोफे पर बैठ जाऊंगी।

सास : और अगर मैं भी आकर सोफे पर बैठ जाऊं तो क्या करोगी?

बहू : तो मैं फर्श पर चटाई बिछाकर बैठ जाऊंगी।

सास : और अगर मैं भी चटाई पर आ जाऊं तो फिर क्या करोगी?

बहू : तो मैं जमीन पर बैठ जाऊंगी।

सास (मजे लेते हुए आगे बोली) : और मैं जमीन पर भी तुम्हारे बगल में बैठ गई तो क्या करोगी?

बहू (खीझकर) : तो मैं जमीन में गड्ढा खोद कर उसमें बैठ जाऊंगी।

सास : और अगर मैं गड्ढे में भी आकर बैठ गई तोसास ने नई बहू से पूछा,?

बहू : तो मैं ऊपर से मिट्टी डालकर सिलसिला खत्म कर दूँगी।

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समस्या – *”बेटा, मेरी बहुएं मेरा कहना नहीं सुनती। सलवार सूट और जीन्स पहन के घूमती हैं। सर पर पल्ला/चुनरी नहीं रखती और मार्किट चली जाती हैं। मार्गदर्शन करो कि कैसे इन्हें वश में करूँ…”*

*समाधान* – आंटी जी चरण स्पर्श, पहले एक कहानी सुनते हैं, फिर समस्या का समाधान सुनाते हैं।

“एक अंधे दम्पत्ति को बड़ी परेशानी होती, जब अंधी खाना बनाती तो कुत्ता आकर खा जाता। रोटियां कम पड़ जाती। तब अंधे को एक समझदार व्यक्ति ने आइडिया दिया कि तुम डंडा लेकर दरवाजे पर थोड़ी थोड़ी देर में फटकते रहना, जब तक अंधी रोटी बनाये। अब कुत्ता *तुम्हारे हाथ मे डंडा देखेगा और डंडे की खटखट सुनेगा तो स्वतः डर के भाग जाएगा रोटियां सुरक्षित रहेंगी*। युक्ति काम कर गयी, अंधे दम्पत्ति खुश हो गए।

कुछ वर्षों बाद दोनों के घर मे सुंदर पुत्र हुआ, जिसके आंखे थी और स्वस्थ था। उसे पढ़ा लिखाकर बड़ा किया। उसकी शादी हुई और बहू आयी। बहु जैसे ही रोटियां बनाने लगी तो लड़के ने डंडा लेकर दरवाजे पर खटखट करने लगा। बहु ने पूँछा ये क्या कर रहे हो और क्यों? तो लड़के ने बताया ये हमारे घर की परम्परा है, मेरी माता जब भी रोटी बनाती तो पापा ऐसे ही करते थे। कुछ दिन बाद उनके घर मे एक गुणीजन आये, तो माज़रा देख समझ गए। बोले बेटा तुम्हारे माता-पिता अंधे थे, अक्षम थे तो उन्होंने ने डंडे की खटखट के सहारे रोटियां बचाई। लेकिन तुम और तुम्हारी पत्नी दोनों की आंखे है, तुम्हे इस खटखट की जरूरत नहीं। *बेटे परम्पराओं के पालन में विवेक को महत्तव दो*।

आंटीजी, *इसी तरह हिंदू स्त्रियों में पर्दा प्रथा मुगल आततायियों के कारण आयी थी*, क्योंकि वो सुंदर स्त्रियों को उठा ले जाते थे। इसलिए स्त्रियों को मुंह ढककर रखने की आवश्यकता पड़ती थी। सर पर हमेशा पल्लू होता था यदि घोड़े के पदचाप की आवाज़ आये तो मुंह पर पल्ला तुरन्त खींच सकें।”

अब हम स्वतन्त्र देश के स्वतन्त्र नागरिक है, राजा का शासन और सामंतवाद खत्म हो गया है। अब स्त्रियों को सर पर अनावश्यक पल्ला और पर्दा प्रथा पालन की आवश्यकता नहीं है।

घर के बड़ो का सम्मान आंखों में होना चाहिए, बोलने में अदब होना चाहिए और व्यवहार में विनम्रता छोटो के अंदर होनी चाहिए।

सर पर पल्ला रखे और वृद्धावस्था में सास-ससुर को कष्ट दे तो क्या ऐसी बहु ठीक रहेगी?

आंटीजी पहले हम सब लकड़ियों से चूल्हे में खाना बनाते थे, लेकिन अब गैस में बनाते है। पहले बैलगाड़ी थी और अब लेटेस्ट डीज़ल/पेट्रोल गाड़िया है। टीवी/मोबाइल/लैपटॉप/AC इत्यादि नई टेक्नोलॉजी उपयोग जब बिना झिझक के कर रहे हैं, तो फिर बहुओं को पुराने जमाने के हिसाब से क्यों रखना चाहती है? नए परिधान यदि सभ्य है, सलवार कुर्ती, जीन्स कुर्ती तो उसमें किसी को समस्या नहीं होनी चाहिए। जब बेटियाँ उन्ही वस्त्रों में स्वीकार्य है तो फिर बहु के लिए समस्या क्यों?

आंटी जी, “परिवर्तन संसार का नियम है”। यदि आप अच्छे संस्कार घर में बनाये रखना चाहते हो तो उस सँस्कार के पीछे का लॉजिक प्यार से बहु- बेटी को समझाओ। उन्हें थोड़ी प्राइवेसी दो और खुले दिल से उनका पॉइंट ऑफ व्यू भी समझो।

बहु भी किसी की बेटी है, आपकी बेटी भी किसी की बहू है। अतः घर में सुख-शांति और आनन्दमय वातावरण के लिए *जिस तरह आपने मोबाइल जैसी टेक्नोलॉजी को स्वीकार किया है वैसे ही बहु के नए परिधान को स्वीकार लीजिये। बहु को एक मां की नज़र से बेटी रूप में देखिए, और उससे मित्रवत रहिये।*

*”सबसे बड़ा रोग- क्या कहेंगे लोग”*, इससे बचिए, क्योंकि जब आपको सेवा की जरूरत होगी तो लोग कभी उपलब्ध न होंगे। आपको *’बेटे-बहु’* ही चाहिए होंगे।

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~Ek Yeh Khawahish Hai Ke Koi,
Zakham Na Dekhey Iss Dil Ke,
Aur Ek Yeh Hasrat Hai Ke Kaash,
Koi Isse Dekhne Wala Hota .. ‘

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Uska wada bi bada azeeb tha..
Jindgi bhar sath nibhayenge..
Mai ye puchna bhul gaya…
Mohobat ke sath.ya..
yado ke sath…,.

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Woh shaks jiski aankhon mein,
inkar ke siwa kuch bhi nahi..!!
Na jane kyun uski aankhon pe,
zindagi lutane ko jee chahta hai…!!

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Jis Ne Is Dour K Insaan Kiye Hain Paida

Wohi Mera Bhi Khuda Ho Mujhe Manzoor Nahi..

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*माँ* के साथ साथ *बीवी* की भी इज्जत ज़रूर कीजिये,
क्योंकि…. ????
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एक ने तुम्हे चंदा मामा दिखाया,
तो दूसरी ने तारे..

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एक तो सुकुन और एक तुम,
कहाँ रहते हो आजकल मिलते ही नही.

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दिल की उम्मीदों का हौंसला तो देखो ,
इंतजार उसका ……
जिसको अहसास तक नहीं ..

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