Wo ‘mili bhi to sirf khuda ke darbaar mein,
Ab tum hi batao yaaron hum ‘ibaadat karte ya mohabbat’.
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Wo ‘mili bhi to sirf khuda ke darbaar mein,
Ab tum hi batao yaaron hum ‘ibaadat karte ya mohabbat’.
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Kya Zaroorat Thi Door Jane Ki ,,
Pass Reh Kar B Mere Kab Thay Tum?
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अगर स्त्री भी एक धन है…
तो मेरे मोहल्ले के आधे से ज्यादा लोगो के
पास भी ‘काला धन’ है ‘बाबा’!!!!!!!!!!!!
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1 baar 300 sardar ship me ja rahe the…ship dubi nhi phir v sab mar gye……
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…..kaise….Kaise…
…
…
Bich samundar me ship ruk gyi thi …
Sare SARDAR DHAKKA dene ke liye utar goye the…
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कोई कमीना हमारे पापा से यह कह बेठा कि
अपने बच्चे पर जरा लगाम रखो…
हमारे पापा ने भी कह दीया की
लगाम तो धोडे को दि जाति है शेर को नही.
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समस्या – *”बेटा, मेरी बहुएं मेरा कहना नहीं सुनती। सलवार सूट और जीन्स पहन के घूमती हैं। सर पर पल्ला/चुनरी नहीं रखती और मार्किट चली जाती हैं। मार्गदर्शन करो कि कैसे इन्हें वश में करूँ…”*
*समाधान* – आंटी जी चरण स्पर्श, पहले एक कहानी सुनते हैं, फिर समस्या का समाधान सुनाते हैं।
“एक अंधे दम्पत्ति को बड़ी परेशानी होती, जब अंधी खाना बनाती तो कुत्ता आकर खा जाता। रोटियां कम पड़ जाती। तब अंधे को एक समझदार व्यक्ति ने आइडिया दिया कि तुम डंडा लेकर दरवाजे पर थोड़ी थोड़ी देर में फटकते रहना, जब तक अंधी रोटी बनाये। अब कुत्ता *तुम्हारे हाथ मे डंडा देखेगा और डंडे की खटखट सुनेगा तो स्वतः डर के भाग जाएगा रोटियां सुरक्षित रहेंगी*। युक्ति काम कर गयी, अंधे दम्पत्ति खुश हो गए।
कुछ वर्षों बाद दोनों के घर मे सुंदर पुत्र हुआ, जिसके आंखे थी और स्वस्थ था। उसे पढ़ा लिखाकर बड़ा किया। उसकी शादी हुई और बहू आयी। बहु जैसे ही रोटियां बनाने लगी तो लड़के ने डंडा लेकर दरवाजे पर खटखट करने लगा। बहु ने पूँछा ये क्या कर रहे हो और क्यों? तो लड़के ने बताया ये हमारे घर की परम्परा है, मेरी माता जब भी रोटी बनाती तो पापा ऐसे ही करते थे। कुछ दिन बाद उनके घर मे एक गुणीजन आये, तो माज़रा देख समझ गए। बोले बेटा तुम्हारे माता-पिता अंधे थे, अक्षम थे तो उन्होंने ने डंडे की खटखट के सहारे रोटियां बचाई। लेकिन तुम और तुम्हारी पत्नी दोनों की आंखे है, तुम्हे इस खटखट की जरूरत नहीं। *बेटे परम्पराओं के पालन में विवेक को महत्तव दो*।
आंटीजी, *इसी तरह हिंदू स्त्रियों में पर्दा प्रथा मुगल आततायियों के कारण आयी थी*, क्योंकि वो सुंदर स्त्रियों को उठा ले जाते थे। इसलिए स्त्रियों को मुंह ढककर रखने की आवश्यकता पड़ती थी। सर पर हमेशा पल्लू होता था यदि घोड़े के पदचाप की आवाज़ आये तो मुंह पर पल्ला तुरन्त खींच सकें।”
अब हम स्वतन्त्र देश के स्वतन्त्र नागरिक है, राजा का शासन और सामंतवाद खत्म हो गया है। अब स्त्रियों को सर पर अनावश्यक पल्ला और पर्दा प्रथा पालन की आवश्यकता नहीं है।
घर के बड़ो का सम्मान आंखों में होना चाहिए, बोलने में अदब होना चाहिए और व्यवहार में विनम्रता छोटो के अंदर होनी चाहिए।
सर पर पल्ला रखे और वृद्धावस्था में सास-ससुर को कष्ट दे तो क्या ऐसी बहु ठीक रहेगी?
आंटीजी पहले हम सब लकड़ियों से चूल्हे में खाना बनाते थे, लेकिन अब गैस में बनाते है। पहले बैलगाड़ी थी और अब लेटेस्ट डीज़ल/पेट्रोल गाड़िया है। टीवी/मोबाइल/लैपटॉप/AC इत्यादि नई टेक्नोलॉजी उपयोग जब बिना झिझक के कर रहे हैं, तो फिर बहुओं को पुराने जमाने के हिसाब से क्यों रखना चाहती है? नए परिधान यदि सभ्य है, सलवार कुर्ती, जीन्स कुर्ती तो उसमें किसी को समस्या नहीं होनी चाहिए। जब बेटियाँ उन्ही वस्त्रों में स्वीकार्य है तो फिर बहु के लिए समस्या क्यों?
आंटी जी, “परिवर्तन संसार का नियम है”। यदि आप अच्छे संस्कार घर में बनाये रखना चाहते हो तो उस सँस्कार के पीछे का लॉजिक प्यार से बहु- बेटी को समझाओ। उन्हें थोड़ी प्राइवेसी दो और खुले दिल से उनका पॉइंट ऑफ व्यू भी समझो।
बहु भी किसी की बेटी है, आपकी बेटी भी किसी की बहू है। अतः घर में सुख-शांति और आनन्दमय वातावरण के लिए *जिस तरह आपने मोबाइल जैसी टेक्नोलॉजी को स्वीकार किया है वैसे ही बहु के नए परिधान को स्वीकार लीजिये। बहु को एक मां की नज़र से बेटी रूप में देखिए, और उससे मित्रवत रहिये।*
*”सबसे बड़ा रोग- क्या कहेंगे लोग”*, इससे बचिए, क्योंकि जब आपको सेवा की जरूरत होगी तो लोग कभी उपलब्ध न होंगे। आपको *’बेटे-बहु’* ही चाहिए होंगे।
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दोस्त1- अरे तू इतना मोटा कैसे हो गया 😂😂
दोस्त2- हमारे घर में फ्रिज नहीं है ना
दोस्त1- तो ?
दोस्त2- कुछ बचा नहीं सकते, सब खाना पड़ता है।
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मैंने उसका साथ दिया एक ढ़ाल की तरह !
वाह वाह !
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वाह वाह !
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गौर फरमाइयेगा ?
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मैंने उसका साथ दिया एक ढ़ाल की तरह,
पर वो पगली ,
सिर्फ दो मिनट में पलट गयी केजरीवाल की तरह..
अब बोलिए ?? वाह वाह ! हा हा हा !
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तेरे चेहरे पे ये शिकन हमें मंजूर नही…!!!
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सुनों तुम खुश रहा करो मैं रहूँ न रहूँ…!!
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ना चाहत के अंदाज़ अलग,
ना दिल के जज़्बात अलग…
थी सारी बात लकीरों की,
तेरे हाथ अलग मेरे हाथ अलग…
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Ruke to chaand, chale to hawaaoon jaiaa hai
Woh shakhs dhoop me dhekhoo to chaaon jaisa hai
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माँ तो माँ है जो पहेचान ही लेती है,*
*की आँखें सोने से लाल है या रोने से !!
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-Guzarr Geya Aj Ka Din Bhii Yoon’Hii Be’Wajah
Naah Mujhe Fursat Milii Naah Usee Khayal Aaya .. ‘
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“I LOVE YOU” बोलने में बस दो सेकंड लगते हैं,
पर समझने समझाने में महीनों लग जाते हैं,
पर इसको साबित करने में पूरी उम्र गुज़र जाती है।
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Taqlik Kaniat Ki Yeh Reet Bari Nirali Hai..
Jo Ho Na Sake Apna Acha Bhi Wohi Lagta Hai..?
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Mohobbat Main Jhukna Koi Ajeeeb Baat Nahi,
Chamakta Suraj Bhi to Dhal Jata Ha Chaand k
Liye.! …
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