मुझे ही लोग खो देते हैं अक्सर किसी को मैं कभी खोता नहीं हूँ
मन्दिर मस्जिद सी थी मोहब्बत मेरी, बेपनाह इबादत थी फिर भी एक न हो सके
haal tum sun lo mera dekh lo surat meri dard wo chiiz nahin hai ki dikhaye koi
पैगामे मोहब्बत हमने भेज दिया लिफाफे में ❤ मर्ज़ी उसकी लिफाफा खोले या यूं ही रख दे
बेकसूर कोई नहीं इस ज़माने मे, बस सबके गुनाह पता नहीं चलते.
वक्त निकाल कर अपनों से मिल लिया करो, अगर अपने ही ना होंगे तो, क्या करोगे वक्त का ???
-Tumharii Yeh Aam Sii Baateiin Mujhey Bohat Khas Lagtii Haii .. ‘
राहों का ख़याल है मुझे.. मंज़िल का हिसाब नहीं रखती। अल्फ़ाज़ दिल से निकलते है.. मैं कोई किताब नहीं रखती।।
तुम चलो तो ये ज़मीं साथ दे ये आसमान साथ दे हम चले तो साया भी साथ ना दे
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