गुज़र रहा हूँ तेरे शहर से क्या कहूँ क्या गुज़र रही है.
बेचैन, उदास और बहुत प्यासी हैं आँखें, तुम पलट कर मुस्कुरा दो तो सब ठीक हो जाए।
दुश्मनी जम कर करो लेकिन इतनी गुंजाइश रहे, जब कभी हम दोस्त हो जायें तो शर्मिंदा कोई न हो..
mere dushman jal jaatey hai mere shahi andaz se, kyoki hum dosti bhi karte mohabat ke andaz se.
इश्क में इसलिए भी धोखा खानें लगें हैं लोग दिल की जगह जिस्म को चाहनें लगे हैं लोग..
मुद्दते हो गई चुप रहते.. कोई सुनता तो हम भी कुछ कहते…!!!
शायद हम ने जिंदगी की कीमत को जाना ही नहीं, वरना किसी के लिए खुद को बर्बाद नहीं करते..
मोहब्बत नाम पाने का ही नहीं है सिर्फ, कभी कभी सबकुछ खोने को भी मोहब्बत कहते है !
-Aap Khud Hi Apnii AdaaO Pe Zara Gaur Kijiye, Hum Araz Krengey Toh Shikayat Hogi .. ‘
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