गुज़र रहा हूँ तेरे शहर से क्या कहूँ क्या गुज़र रही है.
यूँ तो मुझे झूठ से सख्त नफरत थी, लेकिन अच्छा लगता था जब वो मुझे “जान” कहा करती थी..
समय के एक तमाचे की देर है प्यारे मेरी फकीरी क्या, तेरी बादशाही क्या
*तलब ये है कि…. मैं सर रखूँ तेरे सीने पे* *और तमन्ना ये कि….मेरा नाम पुकारती हों धड़कनें तेरी*
वास्ता हमसे, पहले से ही वो, कम रखते हैं… वो हम ही हैं, जो मोहब्बत का भ्रम रखते हैं….!!!
बहुत अकेला कर दिया है मेरे अपनो ने मुझे, समझ नहीं आता कि मैं बुरा हूँ या मेरी किस्मत.
दम तोड़ जाती है हर शिकायत लबों पे आकर, जब मासूमियत से वो कहती है मैंने क्या किया है
JiSki nazron mein hum nhi ache….. Kuch toh woh app bhi bUre honge…
Badal jate hai Wo Log bhi Waqat ki trah… Jinhe Hum Hadd se Jyada Waqat dete hai…!!
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