*यहां लोग अपनी गलती नहीं मानते* *किसी को अपना कैसे मानेंगे…
खामोशियाँ तेरे मेरे बीच…कितनी सच्ची लगती हैं… लफ्जों के धोखे से कहीं दूर…चुपके से हंसते हैं….
तुम्हारे एक लम्हें पर भी मेरा हक नही ना जाने तुम किस हक़ से मेरे हर लम्हें मैं शामिल हो
तकदीर मेँ ढूंढ रहा था तस्वीर अपनी, न ही मिली तस्वीर, ओकात मिल गई अपनी
चलो बिखरने देते है जिंदगी को अब, सँभालने की भी तो एक हद होती है…!
Itna na sataya kar ke raat bhar na so sake hum, Subah ko surkh ankhon ka sabab pochte hain log
नाज़ुक लगते थे जो हसीन लोग, वास्ता पड़ा तो पत्थर के निकले.
बादशास की गली मे आकर कभी पता नही पूछा करते . गुलामो के झुके हुए सर खुदबखुद रास्ता बता देते Continue Reading..
कुछ हसरतें अधूरी ही रह जायें तो अच्छा है … पूरी हो जाने पर दिल खाली सा हो जाता है…
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