~Jiski Sazza Sirf Tum Ho Aiisa Koii Gunaah Karna Hai Mujhe .. ‘
लम्हों की दौलत से दोनों ही महरूम रहे, मुझे चुराना न आया, तुम्हें कमाना न आया।
~जाते वक्त उसने मुजसे अजीब सी बात कही ” तुम जिंदगी हो मेरी, और मुझे मेरी जिंदगी से नफरत है
पाना है मुक्काम ओ मुक्काम अभी बाकी है अभी तो जमीन पै आये है असमान की उडान बाकी है !
मेरी दास्ताँ-ए-वफ़ा बस इतनी सी है, उसकी खातिर उसी को छोड़ दिया…
मीठी यादों के साथ गिर रहा था, पता नहीं क्यों फिर भी मेरा वह आँसु खारा था.
~Phiir Thehr Gyii Aanko’n Meiin Namii Phiir Dil Ne Kaha Ek Terii Kamii .. ‘
कौन कहता है कि मुसाफिर ज़ख़्मी नहीं होते, रास्ते गवाह है बस गवाही नहीं देते.
तने बुरे ना थे जो ठुकरा दिया तुमने हमेँ. तेरे अपने फैसले पर एक दिन तुझे भी अफसोस होगा!!!
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