आँखों के अंदाज़ बदल जाते हैं जब कभी हम उनके सामने जाते हैं
फ़िक्र तो तेरी आज भी है.. बस .. जिक्र का हक नही रहा।
बस आख़री साँस बाकी है ,, तुम आती हो या मैं ले लूँ…
सुख मेरा, काँच सा था.. ना जाने कितनों को चुभ गया..!!
मीठी यादों के साथ गिर रहा था, पता नहीं क्यों फिर भी मेरा वह आँसु खारा था.
रात तो क्या पूरी जिन्दगी भी जाग कर गुजार दूँगा तेरे खातिर ।।।
कैसे गुजर रही है सभी पूछते तो हैं, कैसे गुजारता हूँ कोई पुछता नहीं…
एक मशविरा चाहिए, ख़ुदकुशी करूं या इश्क..
एक छोटी पेंसिल एक विशाल याद्दाश्त से कहीं बेहतर है
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