नाज़ुक लगते थे जो हसीन लोग, वास्ता पड़ा तो पत्थर के निकले.
मेरी आँखों में मत ढूंढा करो खुद को पता है ना.. दिल में रहते हो खुदा की तरह
दुआ करो की..मैं कोई रास्ता निकाल सकूँ… तुम्हे भी देख सकूँ…खुद को भी सम्भाल सकूँ….
Tumne Samjha Hi Nahii Aur Na Hii Samjhana Chaha, Hum Chahtey Hii Kya Thay Tumse Tumhare Siiwa ..
खामोशियाँ तेरे मेरे बीच…कितनी सच्ची लगती हैं… लफ्जों के धोखे से कहीं दूर…चुपके से हंसते हैं….
खुद के खोने का पता ही नहीं चला… , किसी को पाने की ‘इन्तहा’ कर दी मैंने….?
ना पीछे मुड़ के देखो, ना आवाज़ दो मुझको, बड़ी मुश्किल से सीखा है मैंने अलविदा कहना..
कैसे करूँ मैं साबित…कि तुम याद बहुत आते हो… एहसास तुम समझते नही…और अदाएं हमे आती नहीं…
तरस जाओगे मेरे लबोँ से सुनने को एक लफ्ज, प्यार की बात तो दूर, हम शिकायत भी नही करेगे
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