जिस्म छू के तो.. सब गुज़रते हैं.. रूह छूता है कोई.. हज़ारों में..
वक्त निकाल कर अपनों से मिल लिया करो, अगर अपने ही ना होंगे तो, क्या करोगे वक्त का ???
तेरी तो फितरत थी सबसे मोहब्बत करने की. हम तो बेवजह खुद को खुशनसीब समझने लगे
: एक वक़्त था जब हम सोचते थे कि हमारा भी वक़्त आएगा , …. और एक ये वक़्त है Continue Reading..
इतनी ठोकरे देने के लिए शुकरि्य़ा ‘ऐ’ जिन्दगी…. चलने का ना सही….. सम्भलने का हुनर ताे आ ही गया….
Ae gham-e-zindagi na ho naraz, Mujhe ko aadat hai muskuraane ki..
दोनों साथ गये हैं वक्त बिताने डिनर पर.. बातें मगर उनसे.. मोबाइल कर रहा है!
कहता है इबादत करता हूँ पर दिल की जगह जुबा से काम लेता हूँ
तलासी ले ले ए दोस्त मेरी तू भी अगर जेबो में मजबूरी के सिवा कुछ ओर मिले तो ये ज़िन्दगी Continue Reading..
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