गिला बनता ही नहीं बेरुखी का, दिल ही तो है, भर गया होगा।
सिलसिला ये चाहत का दोनो तरफ से था, वो मेरी जान चाहती थी और मैं जान से ज्यादा उसे।
यही सोच कर उसकी हर बात को सच मानते थे.. की इतने खुबसूरत होंठ झूठ कैसे बोलेंगे..
चुप रहना ही बेहतर है, जमाने के हिसाब से ! धोखा खा जाते है, अक्सर ज्यादा बोलने वाले !!
Nazdeek Ho Kar Bhi Woh Itna Door Hai Mujh Sy, Ishara Ho Nahi Sakta, Pukara Ja Nahi Sakta..
दुपट्टा क्या रख लिया सर पे,वो दुल्हन नजर आने लगी…!! उनकी तो अदा हो गई और जान हमारी जाने लगी…!!
अपनी मोहब्बत पर इस कदर यकींन है मुझे की, जो मेरा हो गया वो फ़िर किसी ‘और’ का हो नही Continue Reading..
मुकद्दर में लिखा के लाये हैं दर-ब-दर भटकना.. मौसम कोई भी हो परिंदे परेशान ही रहते हैं…
“झुठ बोलकर तो मैं भी दरिया पार कर जाता, मगर डूबो दिया मुझे सच बोलने की आदत ने…””
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