मुझे नफरत पंसद है मगर,
दिखावे का प्यार नही!!
अन्दाज़ कुछ अलग ही मेरे सोचने का है, मंज़िल का सब को है शौक़, मुझे रास्ते का है….
उसे अपना कहने की बड़ी तमन्ना थी दिल मे, इससे पहले बात लबो पर आती वो गैर हो गये ॥
ये सोच के नज़रें मिलाता ही नहीं कि आँखें कहीं ज़ज्बात का इज़हार न कर दें :))
ऐ-दिल ज़रा मालूम तो कर,कहीं वो तो नहीं आ रहें . महफिल में उठा हैं शोर माशाअल्लाह-माशाअल्लाह
नफरतें जला रही लोगों को बुरी तरह ….. आग को तो यूँ ही बदनाम कर रहे हैं हम …!
जो भी आता हे समजा के चला जाता हे………. पर कोई समझने वाला नही मिलता
जाते उसने पलटकर इतना ही कहा मुझसे मेरी बेवफाई से ही मर जाओगे या मार के जाऊँ”
यही सोच कर उसकी हर बात को सच मानते थे.. की इतने खुबसूरत होंठ झूठ कैसे बोलेंगे..
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