दुआ का यूँ तो कोई रंग नहीं होता मगर दुआ रंग जरुर लाती है
तुम्हे क्या पता किस “दर्द” मे हूँ मैं ! जो कभी लिया ही नही,उस “कर्ज़” मे हूँ मैं
दोनों साथ गये हैं वक्त बिताने डिनर पर.. बातें मगर उनसे.. मोबाइल कर रहा है!
रिश्तेदारी की शादी में मिलने वाले पैंट शर्ट का कपड़ा इधर से उधर घूमता ही रहता है सिल नहीं पाता
सौदा कुछ ऐसा किया है तेरे ख़्वाबों ने मेरी नींदों से.. या तो दोनों आते हैं, या कोई नहीं आता..
दोस्तों ने हमें कूटा , दुश्मन में कहाँ दम था, पिट पिट के भी हँसता रहा, मैं इतना बेशरम था
मेरी बरबादियों में तेरा हाथ है मगर……. में सबसे कह रहा हूँ ये मुकद्दर की बात है…
“आज का ज्ञान! लड़की और नौकरी तभी छोड़ें, जब दूसरी हांथ में हो!”
Bhula dia hota use kab ka ae dost.. kaash ki usne kaha na hota ki mujhe kabhi bhul mat jana.
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