नहीं मिलेगा तुझे कोई हम सा, जा इजाजत है ज़माना आजमा ले.
गुज़र रहा हूँ तेरे शहर से क्या कहूँ क्या गुज़र रही है.
इतनी बेरुखी ना करो कुछ तो रहम करो, तुम पर मरते हैँ तो क्या मार ही डालोगे…
दुपट्टा क्या रख लिया सर पे,वो दुल्हन नजर आने लगी…!! उनकी तो अदा हो गई और जान हमारी जाने लगी…!!
ये शहर आजकल वीरान पड़ा है, सुनने में आया है कि, उनकी पायल खो गयी है।
मैं मानता हूँ खुद की गलतियां भी कम नहीं रही होंगी मगर बेकसूर उन्हें भी कहना मुनासिब नहीं
बड़े अजीब से हो गए रिश्ते आजकल.. सब फुरसत में हैं पर वक़्त किसी के पास नही
एक तो कातिल सर्दी, ऊपर से तेरी यादो की धुंध, बेहाल कर रखा है इश्क मे मौसमो ने भी।….
वो भी आधी रात को निकलता है और मैं भी, फिर क्यों उसे “चाँद” और मुझे “आवारा” कहते हैं
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