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लक्ष्मी

रात 8 बजे का समय रहा होगा, एक लड़का एक जूतों की दुकान में आता है. गांव का रहने वाला था पर तेज था ,उसका बोलने का लहज़ा गांववालो की तरह का था, पर बहुत ठहरा हुआ लग रहा था. लगभग 22 वर्ष का रहा होगा दुकानदार की पहली नज़र उसके पैरों पर ही जाती है. उसके पैर में लेदर के शूज थे,सही से पाॅलीश किये हुये थे।
दुकानदार – क्या सेवा करू ?
लड़का – मेरी माँ के लिये चप्पल चाहिये,किंतु टिकाऊ होनी चाहिये।
दुकानदार – वे आई है क्या ?उनके पैर का नाप ?लड़के ने अपना बटुआ बाहर निकाला, उसको चार बार फोल्ड किया एक कागज़ पर पेन से आऊटलाईन बनाई दोनों पैर की.
दुकादार – अरे मुझे तो नाप के लिये नम्बर चाहिये था. वह लड़का ऐसा बोला मानो कोई बाँध फूट गया हो “क्या नाप बताऊ साहब?
मेरी माँ की जिंदगी बीत गई, पैरों में कभी चप्पलच नही पहनी, माँ मेरी मजदूर है, काँटे झाड़ी में भी जानवरो जैसे मेहनत करके मुझे पढ़ाया,पढ़कर,अब नोकरी लगी. आज पहली तनख़्वाह मिली , होली पर घर जा रहा हूं, तो सोचा माँ के लिए क्या ले जाऊ ? तो मन मे आया कि अपनी पहली तनख़्वाह से माँ के लिये एक चप्पल लेकर जाता हूँ,दुकानदार ने अच्छी टिकाऊ चप्पल दिखाई जिसकी आठ सौ रुपये कीमत थी,चलेगी क्या?वह उसके लिये तैयार था.
दुकानदार ने सहज ही पूछ लिया,कितनी तनख़्वाह है तेरी ?
अभी तो बारह हजार,रहना – खाना मिलाकर सात-आठ हजार खर्च हो जाते है यहाँ,और दो – तीन हजार माँ को भेज देता हूँ.अरे फिर आठ सौ रूपये कहीं ज्यादा तो नहीं.तो बीच में ही काटते हुए बोला.नही कुछ नही होता
दुकानदार ने बाॅक्स पैक कर दिया उसने पैसे दिये.ख़ुशी ख़ुशी वह बाहर निकला.चप्पल जैसी चीज की,कोई किसी को इतनी महंगी भेंट नही दे सकता.पर दुकानदार ने उसे कहा- “थोड़ा रुको! दुकानदार ने एक और बाॅक्स उसके हाथ में दिया.यह चप्पल माँ को तेरे इस भाई की ओर से गिफ्ट.माँ से कहना पहली ख़राब हो जाय तो दूसरी पहन लेना,नँगे पैर नही घूमना और इसे लेने से मना मत करना,मुझें अपना भाई समझो.दुकानदार की और उसकी दोनों की आँखे भर आईं.दुकानदार ने पूछा,क्या नाम है तेरी माँ का?”लक्ष्मी “उसने उत्तर दिया.
दुकानदार ने एकदम से दूसरी मांग करते हुए कहा, उन्हें मेरा प्रणाम कहना और क्या मुझे एक चीज़ दोगे ? वह पेपर जिस पर तुमने अपनी मां के पैरों की छाप बनाई थी,वही पेपर मुझे चाहिये.वह कागज़ दुकानदार के हाथ मे देकर ख़ुशी ख़ुशी चला गया ।वह फोल्ड वाला कागज़ लेकर दुकानदार ने अपनी दुकान के पूजा घर में रख़ा.दुकान के पूजाघर में कागज़ को रखते हुये दुकानदार के बच्चों ने देख लिया था और उन्होंने पूछ लिया कि ये क्या है पापा ?”दुकानदार ने लम्बी साँस लेकर अपने बच्चों से बोला;
“लक्ष्मीजी के पैर ” है बेटा
एक सच्चे भक्त ने उसे बनाया है . इससे धंधे में बरकत आती है.” बच्चों ने, दुकानदार ने और सभी ने मन से उन पैरों को प्रणाम किया……

(सभी माताओं को सादर समर्पित)

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आदत

दिल्ली के चौराहों, सड़कों,गली मोहल्लों और धर्म स्थलों के बाहर बैठकर या फिर शादी ब्याह के अवसरों पर बैठ कर मांग कर खाने वाले और फिर फुटपाथ पर सोने वाले परिवार पिछले लगभग एक डेढ़ महीने से बहुत खुश थे विशेष रूप से उनके बच्चे इसकी वजह थी, सूखी रोटी के टुकड़े को तरसने वालों की ज़िंदगी में पहली बार तीनों समय भरपेट खाना मिल रहा था वो भी ताजी सब्जी के साथ और तो और वो भी बिल्कुल मुफ्त।इतना ही नहीं बिना किसी भेदभाव के सबके साथ बैठ कर,बिना अपमानित हुए सम्मान के साथ, समानता का भाव अनुभव करते हुए जैसे की सभी लोग परिवार के ही हो,आपस में जैसे माता- पिता, भाई- बहनों के साथ बैठ कर खाते हैं।।

ममता जो कि दो बच्चों की मां है,गरीबी की मार सहते बमुश्किल अपने बच्चों का पालन पोषण कर रही थी। कुछ दिनों से वह किसान मोर्चे से प्रभावित होकर रोजाना वह चल रहे लंगर में चली जाती, वहां किसान परिवारों की महिलाओं के साथ सब्जी काटती, आटा गुंधती, रोटियां सेकती,हर एक वह सेवा करती जो बचपन से करना चाहती थी परन्तु कभी भी कर ना पाई….. क्योंकि नीची जाति और मांग कर खाने वालों को तो कोई देहलीज नहीं लांघने देता,सेवा तो दूर की बात उन्हें तो खाना भी दूर से ऐसे दिया जाता जैसे की किसी आवारा कुत्ते या किसी जानवर को…..फिर भले ही वह किसी का घर हो या फिर कोई धार्मिक स्थल…!!
आज जब रात को ममता अपने दोनो बच्चो (13 साल की बेटी जुमरी और 7 साल के बेटे मुन्ना) के लिए रात का खाना लिफाफे में लेकर अाई तो क्या देखती है कि जूमरी पुल के नीचे बुर्जी के सहारे टिक कर मुन्ना को गोद में लिए बैठी थी, मुन्ना उसकी गोद में सो रहा था, जुमरी ने दोपहर वाला खाना भी नहीं खाया था। ममता ने जुमरी के सर पर हाथ फेरते हुए पूछा — “क्या हुआ बेटा? तू ठीक तो है….?
खाना क्यों नहीं खाया.…???
जुमरी—– हां मां मै बिलकुल ठीक हूं!!
ममता — तो फिर खाना क्यों नहीं खाया….??? क्या मुन्ना ने भी नहीं खाया……????
जुमरी —- नहीं मां, मुन्ना ने तो खाया है… मैंने नहीं खाया और रात को भी नहीं खाऊंगी …!!!
ममता — ओ, अच्छा तो मेरी बेटी ने व्रत रखा है??
जुमरी…..नहीं मां व्रत नहीं बस अपनी औकात याद कर रहीं हूं…!!
ममता — हैं? मै कुछ समझी नहीं… सामने खाना पड़ा है…. नहीं खाया, इसमें औकात वाली क्या बात है भला….??
जुमरी—- मां…. जिंदगी में पहली बार मिले साफ सुथरे कपड़े, तीनों समय भर पेट खाना मिलना, कोई भी नफरत नहीं करता, कोई धक्का नहीं मारता,कोई ऊंच नीच का फर्क नहीं,ना मुझे लड़की होने का डर….. क्या जिंदगी इतनी सुन्दर भी ही सकती है या फिर मैं कोई सपना देख रही हूं… क्योंकि आज नहीं तो कल ये शूर वीर योद्धा…. पंजाबी…. अपने अधिकार,अपना हक़ लेकर वापस लौट जाएंगे… रह जाएंगे हम उसी हाल में,मांग कर खाने को,फिर रोज जलील होने को,शादी ब्याह की बच्ची खुची जूठन खाने,मिल जाए तो ठीक नहीं तो भूखे ही सोने को….।

…… काश कि हमारी किस्मत अच्छी होती और हमारा जन्म पंजाब में हुआ होता तो कम से कम भूखा तो नहीं सोते…. यही सोच कर खुद को समझ रही हूं ता की बाद में तंगी होने पर भूख बर्दाश्त करने की आदत बनी रहे….!!!
ममता — शुभ बोल बेटा,शुभ शुभ बोल….!! इन स्वाभिमानी लोगो की कुछ दिनों कि संगत ने मुझे इतना बल दिया है….अब मैं मेहनत करूंगी, गुबारे या कुछ और बेच कर,तुम लोगों को स्कूल भेजूंगी पर अब मांग कर नहीं खाएंगे,किसी के सामने हाथ नहीं फैलाएंगे….तुम्हारे पिता के गुजर जाने के बाद मै कमजोर हो गई थी…पर अब नहीं… मै अपनी गलत आदत बदल दूंगी…।
मुझे या मुझ जैसे कितने ही लोगो को जीवन का सही राह दिखाने वाले और सही पाठ पढ़ाने वाली के लिए मै तो अब दिल से दुआ करती हूं कि…..
….. रब करें पूरी दुनिया ,हमारे पूरे देश का पेट भरने वाले इन किसानों की मांगों को सरकार शीघ्र माने ता की सारी दुनिया का दर्द बांटने वाले ये मेहनत कश लोग राजी खुशी अपने घरों में लौटे, दूसरो को खुशियां बांटना वाले खुद भी खुश और आबाद रहें…. मुझ गरीब की सच्चे हृदय से यही दुआ,अरदास प्रार्थना है…🙏🙏🙏

हरदीप सिंघ ” शुभ” गोइंदवाल साहिब ….. (98153-38993) की कलम का हिंदी रूपांतर द्वारा स: गुरदर्शन सिंघ जबलपुर

Hardip Shubh




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चालीस भाइओं की पहाड़ी

कुछ बर्ष पूर्व कश्मीर की ऊँची पहाड़ियों पर टूस नाम का किसान रहता था। उसके पास बहुत सारी भेंड़े ,और मवेशी थे ,फिर भी पति -पत्नी बहुत दुखी थे। क्योंकि उनकी कोई संतान नहीं था। उनकी प्राथनाएं निष्फल हो रही थी क्योंकि उनकी इच्छा अधूरी थी। एक दिन की बात है एक पीर उस रास्ते से गुजर रहे थे। वे जब टूस के टेंट के पास से गुजर रहे थे तो उन्होंने आवाज़ लगाई -,’मेरे पास ना गोश्त है ,ना ही रोटी का टुकड़ा अपनी खैरात मुझे दे दे। टूस ने जवाब दिया -‘मैं अपनी जिंदगी के हर दिन दयावान रहा हूँ लेकिन आज तक मुझे एक बेटे का वरदान तक नहीं मिला है। इसलिए मैं तुम्हे कुछ नहीं दूंगा। ”जिसे जन्नत ने मना कर दिया ,उसे भला कौन मंजूर कर सकता है। ?पीर दूसरे टेंट की तरफ बढ़ चला। पीर का युवा शिष्य के पास उस दुखी दम्पति को संतुष्ट करने की शक्ति थी लिहाज़ा उसने चालीस कंकड़ इक्कठे किये और टूस की पत्नी की गोद में रख दिए। जाते -जाते उसने उनलोगों को आशीर्वाद भी दिया। निर्धारित समय पर उस स्त्री ने एक ही समय चालीस बेटों को जन्म दिया। .टूस फिर चिंतित हुआ क्योंकि उसे मालूम था की वह इतने बच्चों को एक साथ नहीं पाल सकेगा। उसने अपनी पत्नी से कहा -हमलोग अब एक ही उपाय कर सकते हैं कि अपने पसंद की एक लड़के को रख ले और बांकी को जंगल ले जाकर छोड़ दें।
उन्होंने ऐसा ही किया। उनचालीस बच्चों को जंगल के भेड़ियों के रहमो करम पर छोड़ दिया। एक दिन एक गड़ेरिओं को जो अपनी भेड़ों को चारा रहा था ,एक बंद कंदरा को देखा। वहाँ उसने देखा कि बहुत सारे बच्चे जंगली ट्युलिपों के बीच खेल रहे थे। गड़ेरिआ लड़का डर गया -आखिर इस निर्जन इलाके में इतने बच्चे आये कैसे ?बात फैल गई। टूस के कानो में भी यह बात पड़ी ,वह समझ गया कि वे बच्चे उसके अपने थे। वह उस पहाड़ी की तरफ दौड़ा जहां वे बच्चे खेल रहे थे। टूस को देखते ही वे गुफा में छुप गए. उसकी पत्नी जो अपने बच्चे के विरह वेदना से पीड़ित थी ,ने एक पीर से संपर्क किया। पीर ने कहा -‘उसके भाई को वहाँ ले जाओ ,वहाँ उसे उतार देना और खुद छुप जाना। वे लोग बाहर निकल आये और उस बच्चे के पीछे -पीछे आकर अपनी माँ के पास आ गए। टूस का तो मानो ख़ुशी का कोई ठिकाना नहीं था। गाँव में भोजन और संगीत का इंतजाम हुआ और गरीबों के बीच उपहार बांटा गया। उसने सभी चालीस बच्चों को नमाज़ अदा करना तथा पवित्र किताबें पढ़ना सिखाया। देवदूत अजराइल के फरमान के मुताबिक़ सारे चालीस बच्चे एक ही दिन मर गए। पुरे गाँव में मातम छा गया। सभी मृत चालीस भाइयों को उस पहाड़ी पर ले जाया गया ,जहां वे पाए गए थे ,कहते हैं ,आज भी रहस्य्मय पर्वत पर बच्चे घूमते हैं जिसे कुह -चेहल -तान यानी चालीस भाइयों के नाम से जाना जाता है।

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Maafi

सीतामढ़ी की दुखद घटना ! Please Read 🙏

राधिका और नवीन को आज तलाक के कागज मिल गए थे। दोनो साथ ही कोर्ट से बाहर निकले। दोनो के परिजन साथ थे और उनके चेहरे पर विजय और सुकून के निशान साफ झलक रहे थे। चार साल की लंबी लड़ाई के बाद आज फैसला हो गया था।
दस साल हो गए थे शादी को मग़र साथ मे छः साल ही रह पाए थे।
चार साल तो तलाक की कार्यवाही में लग गए।
राधिका के हाथ मे दहेज के समान की लिस्ट थी जो अभी नवीन के घर से लेना था और नवीन के हाथ मे गहनों की लिस्ट थी जो राधिका से लेने थे।

साथ मे कोर्ट का यह आदेश भी था कि नवीन दस लाख रुपये की राशि एकमुश्त राधिका को चुकाएगा।

राधिका और नवीन दोनो एक ही टेम्पो में बैठकर नवीन के घर पहुंचे। दहेज में दिए समान की निशानदेही राधिका को करनी थी।
इसलिए चार वर्ष बाद ससुराल जा रही थी। आखरी बार बस उसके बाद कभी नही आना था उधर।

सभी परिजन अपने अपने घर जा चुके थे। बस तीन प्राणी बचे थे।नवीन, राधिका और राधिका की माता जी।

नवीन घर मे अकेला ही रहता था। मां-बाप और भाई आज भी गांव में ही रहते हैं।

राधिका और नवीन का इकलौता बेटा जो अभी सात वर्ष का है कोर्ट के फैसले के अनुसार बालिग होने तक वह राधिका के पास ही रहेगा। नवीन महीने में एक बार उससे मिल सकता है।
घर मे परिवेश करते ही पुरानी यादें ताज़ी हो गई। कितनी मेहनत से सजाया था इसको राधिका ने। एक एक चीज में उसकी जान बसी थी। सब कुछ उसकी आँखों के सामने बना था।एक एक ईंट से धीरे धीरे बनते घरोंदे को पूरा होते देखा था उसने।
सपनो का घर था उसका। कितनी शिद्दत से नवीन ने उसके सपने को पूरा किया था।
नवीन थकाहारा सा सोफे पर पसर गया। बोला “ले लो जो कुछ भी चाहिए मैं तुझे नही रोकूंगा”
राधिका ने अब गौर से नवीन को देखा। चार साल में कितना बदल गया है। बालों में सफेदी झांकने लगी है। शरीर पहले से आधा रह गया है। चार साल में चेहरे की रौनक गायब हो गई।

वह स्टोर रूम की तरफ बढ़ी जहाँ उसके दहेज का अधिकतर समान पड़ा था। सामान ओल्ड फैशन का था इसलिए कबाड़ की तरह स्टोर रूम में डाल दिया था। मिला भी कितना था उसको दहेज। प्रेम विवाह था दोनो का। घर वाले तो मजबूरी में साथ हुए थे।
प्रेम विवाह था तभी तो नजर लग गई किसी की। क्योंकि प्रेमी जोड़ी को हर कोई टूटता हुआ देखना चाहता है।
बस एक बार पीकर बहक गया था नवीन। हाथ उठा बैठा था उसपर। बस वो गुस्से में मायके चली गई थी।
फिर चला था लगाने सिखाने का दौर । इधर नवीन के भाई भाभी और उधर राधिका की माँ। नोबत कोर्ट तक जा पहुंची और तलाक हो गया।

न राधिका लोटी और न नवीन लाने गया।

राधिका की माँ बोली” कहाँ है तेरा सामान? इधर तो नही दिखता। बेच दिया होगा इस शराबी ने ?”

“चुप रहो माँ”
राधिका को न जाने क्यों नवीन को उसके मुँह पर शराबी कहना अच्छा नही लगा।

फिर स्टोर रूम में पड़े सामान को एक एक कर लिस्ट में मिलाया गया।
बाकी कमरों से भी लिस्ट का सामान उठा लिया गया।
राधिका ने सिर्फ अपना सामान लिया नवीन के समान को छुवा भी नही। फिर राधिका ने नवीन को गहनों से भरा बैग पकड़ा दिया।
नवीन ने बैग वापस राधिका को दे दिया ” रखलो, मुझे नही चाहिए काम आएगें तेरे मुसीबत में ।”

गहनों की किम्मत 15 लाख से कम नही थी।
“क्यूँ, कोर्ट में तो तुम्हरा वकील कितनी दफा गहने-गहने चिल्ला रहा था”
“कोर्ट की बात कोर्ट में खत्म हो गई, राधिका। वहाँ तो मुझे भी दुनिया का सबसे बुरा जानवर और शराबी साबित किया गया है।”
सुनकर राधिका की माँ ने नाक भों चढ़ाई।

“नही चाहिए।
वो दस लाख भी नही चाहिए”

“क्यूँ?” कहकर नवीन सोफे से खड़ा हो गया।

“बस यूँ ही” राधिका ने मुँह फेर लिया।

“इतनी बड़ी जिंदगी पड़ी है कैसे काटोगी? ले जाओ,,, काम आएगें।”

इतना कह कर नवीन ने भी मुंह फेर लिया और दूसरे कमरे में चला गया। शायद आंखों में कुछ उमड़ा होगा जिसे छुपाना भी जरूरी था।

राधिका की माता जी गाड़ी वाले को फोन करने में व्यस्त थी।

राधिका को मौका मिल गया। वो नवीन के पीछे उस कमरे में चली गई।

वो रो रहा था। अजीब सा मुँह बना कर। जैसे भीतर के सैलाब को दबाने दबाने की जद्दोजहद कर रहा हो। राधिका ने उसे कभी रोते हुए नही देखा था। आज पहली बार देखा न जाने क्यों दिल को कुछ सुकून सा मिला।

मग़र ज्यादा भावुक नही हुई।

सधे अंदाज में बोली “इतनी फिक्र थी तो क्यों दिया तलाक?”

“मैंने नही तलाक तुमने दिया”

“दस्तखत तो तुमने भी किए”

“माफी नही माँग सकते थे?”

“मौका कब दिया तुम्हारे घर वालों ने। जब भी फोन किया काट दिया।”

“घर भी आ सकते थे”?

“हिम्मत नही थी?”

राधिका की माँ आ गई। वो उसका हाथ पकड़ कर बाहर ले गई। “अब क्यों मुँह लग रही है इसके? अब तो रिश्ता भी खत्म हो गया”

मां-बेटी बाहर बरामदे में सोफे पर बैठकर गाड़ी का इंतजार करने लगी।
राधिका के भीतर भी कुछ टूट रहा था। दिल बैठा जा रहा था। वो सुन्न सी पड़ती जा रही थी। जिस सोफे पर बैठी थी उसे गौर से देखने लगी। कैसे कैसे बचत कर के उसने और नवीन ने वो सोफा खरीदा था। पूरे शहर में घूमी तब यह पसन्द आया था।”

फिर उसकी नजर सामने तुलसी के सूखे पौधे पर गई। कितनी शिद्दत से देखभाल किया करती थी। उसके साथ तुलसी भी घर छोड़ गई।

घबराहट और बढ़ी तो वह फिर से उठ कर भीतर चली गई। माँ ने पीछे से पुकारा मग़र उसने अनसुना कर दिया। नवीन बेड पर उल्टे मुंह पड़ा था। एक बार तो उसे दया आई उस पर। मग़र वह जानती थी कि अब तो सब कुछ खत्म हो चुका है इसलिए उसे भावुक नही होना है।

उसने सरसरी नजर से कमरे को देखा। अस्त व्यस्त हो गया है पूरा कमरा। कहीं कंही तो मकड़ी के जाले झूल रहे हैं।

कितनी नफरत थी उसे मकड़ी के जालों से?

फिर उसकी नजर चारों और लगी उन फोटो पर गई जिनमे वो नवीन से लिपट कर मुस्करा रही थी।
कितने सुनहरे दिन थे वो।

इतने में माँ फिर आ गई। हाथ पकड़ कर फिर उसे बाहर ले गई।

बाहर गाड़ी आ गई थी। सामान गाड़ी में डाला जा रहा था। राधिका सुन सी बैठी थी। नवीन गाड़ी की आवाज सुनकर बाहर आ गया।
अचानक नवीन कान पकड़ कर घुटनो के बल बैठ गया।
बोला–” मत जाओ,,, माफ कर दो”
शायद यही वो शब्द थे जिन्हें सुनने के लिए चार साल से तड़प रही थी। सब्र के सारे बांध एक साथ टूट गए। राधिका ने कोर्ट के फैसले का कागज निकाला और फाड़ दिया ।
और मां कुछ कहती उससे पहले ही लिपट गई नवीन से। साथ मे दोनो बुरी तरह रोते जा रहे थे।
दूर खड़ी राधिका की माँ समझ गई कि
कोर्ट का आदेश दिलों के सामने कागज से ज्यादा कुछ नही।
काश उनको पहले मिलने दिया होता?

🙏🙏 अगर माफी मांगने से ही रिश्ते टूटने से बच जाए, तो माफ़ी मांग लेनी चाहिए 🙏🙏

आप का भाई #मोहम्मद_हसन_खान_फैजाबादी

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माँ की महिमा

एक जिज्ञासु ने स्वामी विवेकानंद से प्रश्न किया -इस संसार में माँ की क्या महिमा है ?स्वामी जी ने मुस्करा कर कहा -पांच सेर का एक पत्थर ले आओ। इस पत्थर को किसी कपडे में लपेटकर अपने पेट पर बाँध लो और चौबीस घंटे बाद मेरे पास आओ फिर तुम्हारे प्रश्नो का उत्तर मै दूंगा। स्वामी जी के आदेशानुसार उस व्यक्ति ने ऐसा ही किया अपने पेट पर बांधे पत्थर के साथ उसने दिनभर काम किया परन्तु हर पल उसे थकान और परेशानी का अनुभव होता रहा उसका चलना -फिरना तक असह्य हो गया। थका -मांदा वह स्वामी जी के पास पहुंचा ,और बोला -,’स्वामीजी ,अब और इस पत्थर को देर तक बांधे नहीं रख पाउँगा .’एक प्रश्न के उत्तर के लिए इतनी कड़ी सज़ा नहीं भुगत सकता। ‘स्वामीजी मुस्कराकर बोले -‘सोचो, पेट पर इस पत्थर का बोझ तुमसे कुछ घंटे भी नहीं उठाया जा सका और एक माँ अपने गर्भ में पलने वाले शिशु को पुरे नौ महीनो तक ढोती है। और गृहस्थी का सारा दायित्व भी निभाती है। इस संसार में माँ के अलावा कोई इतना सहनशील और धैर्यवान नहीं है। इसलिए माँ से बढ़कर इस संसार में कोई नहीं है।

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इन्तजार

इन्तजार -एक फ़क़ीर नदी के किनारे बैठा था ,एक राहगीर ने बाबा से पूछा -बाबा क्या कर रहे हो ?फ़क़ीर ने जवाब दिया ,-‘इंतज़ार कर रहा हूँ कि पूरी नदी बह जाये तो पार करूँ ‘.उस व्यक्ति ने आश्चर्य से पूछा -कैसी बातें करते हो बाबा ,पूरा जल बहने के इंतज़ार में तो तुम कभी नदी पार नहीं कर पाओगे फ़क़ीर ने कहा ,’यही तो तुम लोगों को समझाना चाहता हूँ कि तुम लोग हमेशा यही सोचते हो कि एक बार जीवन की साड़ी जिम्मेवारियां पूरी हो जाएँ तो मौज करूँ ,भ्रमण करूँ ,लोगों से मिलु -जुळू,सबकी सेवा करूँ —पर जैसे नदी का जल कभी ख़त्म नहीं होता उसी प्रकार जीवन ख़त्म हो जाएगा पर जीवन के काम ख़त्म नहीं होंगे। जीवन का यही तो कडुवा सच है।
जिसने जिंदगी दी है उसका /साया भी नज़र नहीं आता /यूँ तो भर जाती है झोलियाँ /मगर देनेवाला नज़र नहीं आता /उनकी परवाह मत करो /जिनका विश्वास वक़्त के साथ बदल जाए /परवाह सदा उनकी करो /जिनका विश्वास आप पर तब भी रहे /जब आप का वक़्त बदल जाये .और चलते -चलते -जब भी सोचता हूँ कि आज कोई पोस्ट नहीं डालूंगा —तभी अन्तरात्मा से आवाज़ आती है -उठो पार्थ ,मोबाइल उठाओ और अपने धर्म का पालन करो।

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सुखी परिवार

एक गांव में दो बुजुर्ग आपस में बातें कर रहे थे। पहले ने कहा -मेरी इकलौती पोती शादी के लायक हो गई है। अच्छी नौकरी करती है। उसका कद ५फ़ीट २ इंच है। सुन्दर और शुशील है। कोई अच्छा लड़का आपकी नज़र में हो तो बताएगा। दूसरे ने कहा ,’आपको किस तरह का परिवार चाहिए ?’.पहला-कुछ ख़ास नहीं,लड़का एम ऐ या एम्टेक किया हो अपना बंगलो हो,कार हो अच्छा जॉब हो। लाख दो लाख की सैलरी हो। –दूसरा -और कुछ? पहले ने कहा -हाँ ,कहना ही भूल गया। लड़का अकेला होना चाहिए,माँ-बाप भाई बहन बिलकुल नहीं होना चाहिए–वो क्या है ना भाई साहब,लड़ाई-झगडे होते रहते हैं।.दूसरे बुजुर्ग की आँखें भर आई। कुछ पल मौन रहने के बाद उन्होंने कहा-मेरे दोस्त का एक पोता है। वह बिलकुल अकेला है माँ-बाप की मृत्यु एक भयानक एक्सीडेंट में हो गया। लड़का अच्छे जॉब में है। डेढ़ लाख पर मंथ सैलरी मिलती है। गाडी है। बंगलो है नौकर-चाकर है। पहला बुजुर्ग यह सुनकर प्रसन्न हुए ,कहा-तो करवाओ ना रिश्ता पक्का। दूसरे ने कहा-मगर उस लड़के का केवल एक ही शर्त है कि लड़की के माँ-बाप,भाई-बहनया कोई रिश्तेदार ना हो।अगर आपका परिवार आत्महत्या कर ले तो बात बन सकती है आपकी पोती वहाँ बहुत सुखी रहेगी। पहला तनिक क्रोध में बोला-भला ये क्या बकवास है? हमारा परिवार क्यों करे आत्महत्या? कल को उसकी खुशियों में/गम में कौन उसके साथ और उसके पास होगा? दूसरा-वाह मेरे दोस्त,खुद का परिवार है और दूसरे के परिवार के बारे में नहीं सोचना। मेरे अज़ीज़,अपने बच्चों को परिवार के महत्व को समझाओ.घर ही तौ एक छोटा संसार की तरह है घर के छोटे ,बड़े सभी बड़े-छटे अपनों के लिए जरूरी है। अगर ये ना हों तो इंसान खुशियों का,गम का महत्त्व ही भूल जाएगा। जिंदगी तो बिलकुल नीरस हो जायेगी.परिवार है जीवन में हर ख़ुशी,ख़ुशी लगती है। अगर परिवार ही ना हो तो खुशियों,ग़मों को किससे बाटेंगे। अच्छी सोच रखें,अच्छी सीख अपने बच्चों को दें। सच कहा किसी ने-टूटेगा हर सपना,अगर बिखरता है परिवार-साथ अगर अपनों का हो तो होगा खुशियों का अम्बार आओ कामना करें कि बिखरे ना किसी का परिवार मिल-जुल कर रहें सब हर दिन हो जाये त्यौहार अपनेपन की एक सुन्दर बगिया है खुशहाली का द्वार जीवन भर की एक पूंजी है एक सुखी परिवार।

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अहंकार

अहंकार – बात पुराने -जमाने की है। एक अहंकारी राजा के महल में एक महात्मा पहुंचे। राजा खुश थे सो बोले आज आपको मुहं -माँगा उपहार देना चाहता हूँ। महात्मा ने कहा -राजन आप अपने मन की सबसे प्रिय वस्तु दे दो। राजा ने कहा -मैं अपने राज्य का सारा कोष आपको समर्पित करना चाहता हूँ। महात्मा ने कहा -पर यह तो प्रजा का है आप तो केवल देखरेख करने वाले हैं। राजा ने कहा -यह महल सवारी सब ले लो ,पर यह भी तो सब प्रजा का है। अंततः राजा ने अपना शरीर दान स्वरुप देना चाहा। इसपर महात्मा ने कहा -यह शरीर तो आपका अवश्य है पर इसपर आपकी पत्नी और बच्चों का भी हक़ है तो भला आप अकेले कैसे निर्णय लोगे ?राजा निरुत्तर हो गए। महात्मा ने कहा -आपके मन का अहंकार ही सिर्फ आपका है। अहंकार ही इंसान को अधोगति प्राप्त करवाता है। आप इसका दान कर सकते हो। इसके बाद तो राजा ने अहंकार करना ही छोड़ दिया।




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कायर

संन ११७८ -जुंग का मैदान ,गुजरात के सोलंकी राजा अजयपाला के देहावसान के सात साल गुजर चुके थे। सिंहासन ८-१० साल का पुत्र बैठा है। राजधानी से तक़रीबन ४० किलोमीटर पर मोहमद गोरी अपनी सेना के साथ शिविर लगाए बैठा है। वह मुल्तान को फतह करने के बाद गुजरात को लूटने का मंसूबा पाले बैठा है। गोरी का सन्देश वाहक दरबार में आता है और फरमान गोरी का सुनाता है। रानी और बालक के साथ सारा धन -दौलत दे दो तो वह बिना खून -खराबे का लौट जाएगा। रानी नैकीदेवी ने संदेशवाहक को शर्त मान लेने के आश्वासन के साथ वापस भेज देती है। गोरी सन्देश सुनकर ख़ुशी से झूम उठता है। थोड़ी ही देर में उसकी साड़ी ख़ुशी काफूर हो जाती है। उसे अपने खेमे की तरफ हाथियों और घोड़ों की झुण्ड आती दिखाई देती है। रानी की सेना मलेक्षों पर टूट पड़ती है। रानी द्रुत गति से मलेक्षों के सर को धड़ से अलग करती आगे बढ़ती है। तभी उसकी तलवार का सामना गोरी से हो जाती है। रानी उसके अग्र भाग पर वार करती है और वह रक्त -रंजित होकर अपना घोड़ा लिए सीधे मुल्तान की तरफ पलायन कर जाता है। रास्ते में अगर किसी सैनिक का या उसका घोड़ा थक कर गिर पड़ता तो भी वे लोग घोड़े बदल कर भाग रहे थे। डर का ये आलम था। गोरी के मन में उसके बाद दहशत का ये आलम था कि उसने दिल्ली पर तो वार किया पर फिर गुजरात की तरफ मुड़ के कभी नहीं देखा।यह गाथा इतिहास के पन्नों में कही दफ़न हो गई पर स्वाभिमान के साथ जीना सीखा गई।




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स्वयम्बर और बोझ

एक राजा था जो बहुत दयावान और प्रजाप्रिय था। उसकी एक बेटी थी जो बहुत सूंदर और विदुषी थी। राजकुमारी जब सयानी हुई तब राजा को उसकी शादी की चिंता सताने लगी। उन्होंने इस बारे में राजकुमारी की राय जाननी चाही। राजकुमारी ने कहा कि जो मेरे पसंद का दीपक ला देगा उसी से मैं ब्याह करुँगी /और अगले ही दिन इसी शर्त के साथ राजकुमारी के स्वयम्बर की घोषणा कर दी गई। स्वयम्बर के दिन हाथ में दीपक लिए युवकों की कतार लग गई। सब के पास तरह -तरह के दीपक थे। सूंदर नक्काशी वाले दीपक ,सोने -चांदी के दीपक। राजकुमारी एक -एक करके दीपकों को देखती अंतिम कतार तक पहुँच गई। अंतिम व्यक्ति के हाथ में कोई दीपक नहीं था। राजकुमारी ने पूछा -आप अपने साथ कोई दीपक नहीं लाये ?युवक ने थोड़ी सी गीली मिटटी लिया फिर उसे अपने बाएं हाथ में लिया और दाहिने हाथ की केहुनी से दबा दिया मिटटी का दीपक तैयार हो गया। राजकुमारी ने मुस्करा दिया और वरमाला उस युवक के गले में डाल दी। दीपक का प्रयोजन तो प्रकाश से है फिर वह सोने का हो या मिटटी का। दरअसल राजकुमारी को दीपक की भला क्या जरूरत थी ,वह तो सिर्फ प्रतिभा और दूरदर्शिता की परीक्षा ले रही थी।

[२]बोझ -दो बौद्ध भिक्षु थे जो बाढ़ में डूबे एक इलाके से गुजर रहे थे. वे ब्रह्मचारी थे इसलिए उन्हें औरतों को छूने की मनाही है। उन्होंने उन्होंने बाढ़ में फँसी झोपड़ी के छत पर एक खूबसूरत .बाला को देखा। मूसलाधार बारिश हो रही थी और उस बाला बाला के प्राण संकट में थे. .बड़े भिक्षु ने कहा बच्ची ,- चढ़ जा मैं पार ले। चलूँगा दूसरे ने सोचा -मुझे ज्ञान सिखाता है। मौक़ा मिला ,तो खुद को रोक नहीं सका। मुझे उठाने के लिए कह सकता था। मैं तो तो उससे बलिष्ठ और जवान। हूँ इतनी बेताबी ?वह जितना देखता ,सोचता उसमे अपराध और हीन भावना से ग्रसित हो। जाता। क्रोध ने उसके विवेक परास्त कर दिया था। जब पटाक्षेप तब सोते भिक्षु को जगाकर पूछा -,’सफाई .’दो अपनी। ‘कैसी सफाई?’महिला ‘युवा भिक्षु .ओह वो ,उसे तो मैं वहीँ पीछे छोड़ आया। पर तुम अभी तक लिए-लिए फिर रहे हो। ,देख पुत्तर ज्यादातर बोझ जो हम ढोते रहते हैं वे सिर्फ मन के बोझ होते हैं तूं तो अपने सभी दर्द को याद रखता है बिस्मरण घाव को भर देता है जिन बातों को हम माफ़ नहीं कर सकते उन्हें भी हमें जाने देना चाहिए। जब तक हम उन्हें दूर नहीं हटाते तब तक आगे का अपना सफर शुरू नहीं कर सकते।




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उत्तराधिकारी

उत्तराधिकारी-बहुत पूर्व की बात है ,एक प्रतापी राजा थे। प्रजा खुशहाल थी। पर धुकड़ प्रसंग यह था की राजा निःसंतान थे। राजा चिंतित रहते थे की उनकी देहावसान के बाद इस राज्य का कौन उत्तराधिकारी होगा ?राजा ने काफी सोच विचार के बाद एक तरकीब सोची। उन्होंने अपने राज्य में ढिंढोरा पिटवाया की राज्य के सभी नौजवान कल दरबार में इकट्ठे हों। दूसरे दिन सभा में राजा ने एलान किया की वे उपस्थित युवकों में से एक को सिंहांसन सौपेंगे। सभी चकित थे ,राजा ने कहा की वे सभी को एक -एक बीज देंगे ,जिसे उनको गमले में लगना है। एक साल के बाद सभी गमले के साथ राज दरबार में अनिवार्य रूप से उपस्थित होना है। उन्होंने सभी को एक एक बीज दिया। सभी बहुत खुश थे। उनलोगों ने मिटटी के गमले में बीज डाल। सभी के गमले में पेड़ उग आये पर दिया और पानी से सींचा। सभी के गमले में पेड़ उग आये एक को छोड़कर। एक ूवा जिसके गमले में पौधा नहीं उगा था ,बेचारा परेशान था। पानी से सींचा ,खाद दिया ,फिर भी पौधा नहीं उगा जबकि औरों के पौधे बड़े और हरे -भरे उग आये थे। वह युवा निराश हो चुका था। एक बर्ष बीत गए। सभी युवक अपने -अपने गमले के साथ राज दरबार में उपस्थित हुए। सब काफी प्रसन्न थे क्योंकि उनके गमले में पौधे हरे -भरे लहलहा रहे थे। सिर्फ वह युवा जिसके गमले में पौधा नहीं पनप पाया था ,खाली गमले के साथ उपस्थित था। सभी उसपर हंस रहे थे। राजा ने घोषणा की। उन्होंने उस युवा को ,जिसका गमला खाली था को अपना उत्तराधिकारी चुना। सभी अन्य हतप्रभ थे। राजा ने कहा -आप सबों को मैंने उबली हुए बीजें दी थी। फिर पौधा कैसे आ गया ? आप लोगों ने छलपूर्वक दूसरे बीज को गमले में उगाया जबकि यह नौजवान ने छल का सहारा नहीं लिया इसलिए मैं इन्हे अपना उत्तराधिकारी चुनता हूँ। सच्चे और ईमानदार आदमी हमेशा अपने जीवन में सफल होते हैं।

[२]नुक्ते के हेरफेर से। -यह एक सच्ची घटना है।एक पुलिस कप्तान चुनाव से पहले मीटिंग की। लॉ एंड आर्डर बरकार रखने के लिए तथा शांतिपूर्ण मतदान कराने हेतु बैठक बुलाई गई थी। जिले के अन्य आला अफसर तथा सभी पत्रकार भी उपस्थित थे। अपने ब्रीफिंग में कहते -कहते उन्होंने कहा की -आपका जिला बहुत चोट्टा जी [अहिन्दी भाषी थे ]]इसलिए क़ानून व्यवस्था ठीक रहेगा जी। अब तो नज़ारा ही बदल गया। सभी पत्रकारों ने हंगामा मचाना शुरू कर दिया। वे अपने आप को अपमानित महसूस करने लगे तथा मीटिंग का बहिस्कार करने की घोषणा कर दी। स्थिति की नाजुकता को भांपते हुए जिलाधिकारी ने कहा -आप लोग कृपया भ्रमित मत हों। दरअसल कप्तान साहब का कहने का तत्प्रय यह था की आपका जिला बहुत छोटा है। चूँकि ये अहिन्दी भाषी हैं इसलिए उच्चारण में चूक हो गयी कृपया इसे अन्यथा नहीं लिया जाये . मामला शांत हुआ और मीटिंग तब जाकर शांतिपूर्ण संपन्न हुआ।




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इकतीख तारीख

वह सुबह से ही मंदिर के अहाते में आकर बड़ी देर से बेहद उदास होकर बैठी थी ।लगता था कि वह भूखी भी है ।पुजारी जी ने उसे देखते ही पूछा- “माई,लगता है आज इकतीख तारीख है ।” “हाँ,पंडित जी ।” “तो तू,उदास क्यों होती है,आज का दिन यहीं गुज़ार,और यहीं खाना खा ।” इतना सुनते ही वह अतीत में पहुँच गई। पति के निधन के बाद मेहनत-मजदूरी करके उस औरत ने अपने दोनों बेटों को पाल-पोसकर, पढ़ा-लिखाकर इस क़ाबिल बनाया था,कि वे दोनों सरकारी नौकरी में और एक अच्छी पत्नी को पा सकें ।पर शादी के बाद दोनों भाइयों में नहीं बनी तो उन्होंने घर-मकान का बंटवारा कर लिया, पर कोई भी बेटा माँ की पूरी ज़िम्मेदारी लेने को तैयार नहीं था। अंत में लाचार होकर दोनों भाइयों ने पंद्रह-पंद्रह दिन के लिए माँ की जिम्मेदारी ले ली ।पर विडंबना कि जब महीना इकत्तीस दिन का होता था तो माँ को एक दिन मंदिर में जाकर गुज़ारा करना पड़ता था । “माई ,कहाँ खो गई?ये भोग तो खा,और आराम कर ।” पुजारी की आवाज़ सुनते ही वह वर्तमान में लौट आई ,और आँसू पौंछकर भोग लेकर खाने लगी। -प्रो.शरद नारायण खरे




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परमात्मा का स्वरुप

नचिकेता बाजश्रवा ऋषि के पुत्र थे। उन्होंने यमराज से तीन वर प्राप्त किया था। उन्होंने नचिकेता को ज्ञानोपदेश दिया था। इन दोनों के बीच संवाद पठनीय है। नचिकेता -किस तरह से होता है ब्रह्म का ज्ञान और दर्शन ?मनुष्य के शरीर में दो आँख ,दो नाक के छिद्र ,दो कान ,एक मुहं ,नाभि ब्रह्मरंध ,,गुदा ,एवं शिश्न के रूप में ११ दरवाजे वाले नगर की तरह है जो ब्रह्म की नगरी है। वे मनुष्य के ह्रदय में रहते हैं।इस रहस्य को जानकार जो ध्यान और चिंतन करता है,उसे किसी प्रकार का दुःख नहीं होता। और ऐसे लोग जन्म -मृत्यु के बंधन से मुक्त हो जाते हैं। प्रश्न -क्या आत्मा मरती या मारती है ?–जो लोग ऐसा मानते हैं दरअसल वे आत्मा को नहीं जानते और भटके हुए हैं। क्योंकि ना तो आत्मा मरती है और ना ही किसी को मार सकती है। प्रश्न -क्या ह्रदय में परमात्मा का वास होता है ?-मनुष्य का ह्रदय ब्रह्म को पाने का स्थान माना जाता है। उसका ह्रदय अगूंठे के माप का होता है अपने ह्रदय में भगवान् का वास मानने वाले दूसरों के ह्रदय में भी ब्रह्म इसी तरह विराजमान हैं। इसलिए दूसरों की बुराई या घृणा से दूर ही रहना श्रेष्यकर है। प्रश्न -क्या है आत्मा का स्वरुप ?-शरीर तो नाशवान है पर जीवात्मा का नाश नहीं होता। आत्मा का भोग -विलाश ,अनित्य ,और जड़ शरीर से कोई लेना -देना नहीं है। यह दोष रहित है। इसका ना तो कोई कारण है ,ना कार्य यानि इसका ना कोई जन्म होता है ,ना। मृत्यु। प्रश्न –आत्मा -परमात्मा के ज्ञान को नहीं जाननेवाले को कैसे फल भोगने पड़ते हैं ?–जिस तरह बारिश का पानी एक ही होता है ,और ऊंचाई से नीचे की ऒर का प्रवाह एक जगह नहीं रूक्ता ,कई प्रकार के रूप रंग और गंध में बदलता है उसी तरह एक ही परमात्मा से जन्म लेने वाले देव ,असुर ,और मनुष्य भगवान् को भी अलग -अलग स्वरुप में मानते और पूजा करते हैं। और बर्षा -जल की तरह ही सुर -असुर कई योनियों में भटकते रहते हैं। प्रश्न -आत्मा निकलने के बाद शरीर में क्या रह जाता है -?
आत्मा के शरीर छोड़ने के बाद उसके साथ प्राण और इन्द्रिय ज्ञान भी निकल जाता है। मृत शरीर में क्या बांकी रह जाता है ,यह तो दृश्टिगोचर नहीं होता लेकिन वह परब्रह्म उस शरीर में रह जाता है जो प्रत्येक चेतन और जड़ प्राणी में विद्यमान है प्रश्न -मृत्यु के बाद आत्मा को कौन सी योनियाँ मिलती हैं ?—अच्छे और बुरे कार्यों और शास्त्र ,शिक्षा ,गुरु संगति और व्यापार के माध्यम से देखी -सुनी बातों के आधार पर पाप -पुण्य होते हैं। इनके आधार पर ही आत्मा मनुष्य या पशु के रूप में नया जन्म प्राप्त करती है। जो लोग अधिक पाप करते हैं वे अन्य योनियों जैसे पेड़ -पौधों पहाड़ ,तिनकों में जन्म पाते हैं। यमदेव ने नचिकेता को ॐ को पततिक रूप में परब्रह्म का स्वरुप बताया। ओंकार ही परमात्मा का स्वरुप है।

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क्रोध की अग्नि

प्राचीन काल की बात है ,आदि शंकराचार्य और मंडान मिश्र के बीच सोलह दिनों तक शास्तार्थ चला। और इस शास्तार्थ की निर्णायक थी -भारती जो मंडान मिश्र की धर्म पत्नी थी। हार -जीत का निर्णय बांकी था की इसी बीच कुछ जरूरीकार्यवश भारती को बाहर जाना पड़ा ,जाने से पहले भारती ने दोनों विद्वानों के गले में एक -एक फूलों की माला डालते हुए कहा कि ये दोनों मालाएं ही मेरी अनुपस्थिति में हार और जीत की फैसला करेगी। जब भारती वापस लौटी तो उन्होंने फूल मालाओं को देखकर आदि शंकराचार्य को विजयी घोषित किया तथा मंडान मिश्रा को पराजित माना। यानी अपने ही पति को पराजित करार दिया। श्रोतागण हैरान थे उन्होंने भारती के सम्मुख अपनी जिज्ञासा रखी ,आखिर वे इस निर्णय पर कैसे पहुंची ? देवी भारती ने जवाब दिया -जब भी कोई विद्धान पराजित होने लगता तो वह अंदर ही अंदर क्रुद्ध होने लगता है। और क्रोधः की ताप से मेरे पति की माला सुख चुकी थी जबकि आदि शंकराचार्य की माला अब भी तरोताजा है। इससे साबित होता है कि शंकराचार्य विजयी हुए हैं।
विदुषी भारती का यह निर्णय का तरिका सुनकर सभी ने उनकी प्रशंसा की। क्रोध एक ऐसी ज्वाला है जो पहले हमारे विवेक को नष्ट कर देती है। और हम जीतते -जीतते भी हार जाते हैं। लाख अच्छाईया हों क्रोधित व्यक्ति अन्तः पराजित ही होता है। यह रिश्तों में दरार भी ला देता है। यह भी सच है कि परिस्थितिजन्य कारणों से क्रोध उतपन्न होता है और इस पर विजय प्राप्त करना कठिन होता है पर प्रयास करें तो धीरे- धीरे इसे काम तो किया ही जा सकता है। क्रोध के मूल करने को समझकर इसे सुधारने का प्रयास करें तो स्वतः क्रोध काम होना शुरू हो जाएगा। जीवन की सरसता के लिए क्रोध रूपी अग्नि को बुझाना ही पड़ता है।

जहीर कुरैशी ने क्या खूब लिखा है -क्रोध रोके रुका ही नहीं /मुट्ठियों में बंधा ही नहीं /कैसे मंज़िल पे पहुंचेगा ,आजतक जो चला ही नहीं /बाँटते -बाँटते कर्ण की गाँठ में कुछ बचा ही नहीं /जो लिपट न सकी पेड़ से /सच कहूं वो लता ही नहीं /ऋण सभी पर रहा सांस का /मरते दम तक चुका ही नहीं।




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बोध कथा

एक भिखारी सड़क किनारे बर्षों से भीख मांग रहा था। फिर एक समय आया और वह मर गया। वह राजा बनाना चाहता था। यह बड़ी बेतुकी बात थी ,भिखारी का सम्राट बनने का स्वप्न देखना ?वह चूँकि एक लम्बे अरसे से भीख मांग रहा था सो उस इलाके का वह मशहूर भिखारी हो गया था। पर राजा नहीं बन सका। फिर मौत तो आणि ही थी। मौत अमीरों को भी आती है ,भिखारी को भी। जब वह मर गया तो लोगों ने उसके लाश को उठवाकर फिंकवा दिया। गंदे चीथड़े ,,बर्तन -भांडे सब हटवा दिए। पूरी गन्दगी फैली थी। सबने मिलकर उस स्थल को साफ किया। उस जगह की मिटटी भी हटवानी शुरू कर दी। ताकि जमींन भी साफ़ हो जाये .जब मिटटी खोदी तो उपस्थित लोग हक्के- बक्के रह गए। भीड़ लग गई।
माज़रा यह था कि जिस जगह पर भिखारी बर्षों से बैठा करता था वहाँ नीचे एक बड़ा खज़ाना गड़ा था। जिसमे बहुमूल्य हीरे -जवाहरात थे ,सोने की अशर्फियाँ थी। सब कहने लगे ,-कैसा पागल भिखारी था ,जिंदगी भर भीख माँगता रहा पर उसे पता तक नहीं था कि जिस जगह पर वह बैठकर भीख मांग रहा है उसके नीचे एक बड़ा खज़ाना है। सचमुच वह बड़ा अभागा था। इन बेशकीमती रत्नो से राजा बन सकता था पर उसने जमींन नहीं खोदी और जीवन भर पाई-पाई भीख मांगता रहा। इसे ही तो नियति का खेल कहते हैं।प्रेम का खज़ाना तो अंदर है। पर जिसे देखो वह कुछ मांग रहा है ,प्रेम मांग रहा है। प्रेम का खज़ाना खोदते -खोदते तो ही परमेश्वर के ख़ज़ाने तक पहुँच सकता है। इस गूढ़ रहस्य को समझना होगा। जिनके पास खुद ही प्रेम नहीं हो वह दूसरों को क्या प्रेम देगा ?

सच कहा है किसी कवि ने -प्रेम अलौकिक है /प्रेम दिव्य है /प्रेम आत्मा का है रंजन /प्रेम अहं से प्रे अवतरित प्रेम स्वयं का है विसर्जन।




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आत्मग्लानि

एक समय की बात है कि एक डाकू गुरु नानकदेव के पास आया और उनकी चरणों में गिड़ पड़ा। उसने आर्त स्वर में कहा -,गुरुदेव मैं अब इस डाकू की जिंदगी से तंग आ व्हुका हूँ। इस जीवन से छुटकारा चाहता हूँ ,कृपया मुझे सही मार्गदर्शन बताइये। गुरु नानक देव ने कहा -‘अगर तुम सचमुच अच्छा इंसान बनना चाहते हो तो त सारे बुरे कर्मों को छोड़ दो। ‘कुछ दिनों बाद वह फिर आया और कहा ,’नानक जी ,चोरी करना और समस्त बुरे कार्य को छोड़ नहीं पा रहा हूँ। नानकजी ने कहा -तुम चोरी करने और खराब करने के बाद तुम सबके सामने अपने कार्यों का वर्णन करो। यह कार्या तो अत्यंत ही दुरूहपूर्ण था। अपने खराब कार्यों को लोगों के समक्ष कहने में उसे बहुत तकलीफ होती थी लिहाज़ा उसे अपने खराब कार्यों से स्वयं ही घृणा होने लगी। एक दिन वह फिर नानकडोजी के पास पहुंचा और कहा -उसे अपने कुकृत्यों पर आत्मग्लानि होती थी इसलिए उसने समस्त गलत कार्यों को हमेशा के लिए छोड़ दिया

[२] राजकुमार -कुछ समय पूर्व एक राजा कुशलता पूर्वक शासन कर रहा था .उसके राज्य में चहुँ तरफ शान्ति का माहौल था। राजा का एक लड़का था जो देखने में अति सुन्दर ,बलशाली ,और वीर प्रतीत होता था पर वास्तव में उसकी बुद्धि बहुत कमज़ोर थी। उसकी बुद्धि बढ़ाने के लिए राजा ने कई उपाय किये ,यज्ञ ,पूजा करवाए परन्तु कोई लाभ नहीं हुआ। आखिरकार राजा ने उसे एक ज्ञानी महात्मा के पास भेज दिया। कुछ बर्षों बाद राजा ने राजकुमार की परीक्षा ली। राजा ने अपनी मुट्ठी में एक अंगूठी रख ली और राजकुमार से पूछा -कि उनके मुट्ठी में क्या है ? राजकुमार कुछ सोचने के बाद कहा -,राजन ,आपके मुट्ठी में कोई ऐसी वस्तु है जिसका आकार गोल तथा चक्की के पाट जैसी है। राजा उत्तर सुनकर बहुत निराश हुए चक्की जैसी वस्तु मुट्ठी में कैसे समा सकती है ?इसलिए इंसान को किताबी ज्ञान तो दिया जा सकता है पर व्यवारहिक ज्ञान तो स्वयं आता है।




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