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उत्तराधिकारी

उत्तराधिकारी-बहुत पूर्व की बात है ,एक प्रतापी राजा थे। प्रजा खुशहाल थी। पर धुकड़ प्रसंग यह था की राजा निःसंतान थे। राजा चिंतित रहते थे की उनकी देहावसान के बाद इस राज्य का कौन उत्तराधिकारी होगा ?राजा ने काफी सोच विचार के बाद एक तरकीब सोची। उन्होंने अपने राज्य में ढिंढोरा पिटवाया की राज्य के सभी नौजवान कल दरबार में इकट्ठे हों। दूसरे दिन सभा में राजा ने एलान किया की वे उपस्थित युवकों में से एक को सिंहांसन सौपेंगे। सभी चकित थे ,राजा ने कहा की वे सभी को एक -एक बीज देंगे ,जिसे उनको गमले में लगना है। एक साल के बाद सभी गमले के साथ राज दरबार में अनिवार्य रूप से उपस्थित होना है। उन्होंने सभी को एक एक बीज दिया। सभी बहुत खुश थे। उनलोगों ने मिटटी के गमले में बीज डाल। सभी के गमले में पेड़ उग आये पर दिया और पानी से सींचा। सभी के गमले में पेड़ उग आये एक को छोड़कर। एक ूवा जिसके गमले में पौधा नहीं उगा था ,बेचारा परेशान था। पानी से सींचा ,खाद दिया ,फिर भी पौधा नहीं उगा जबकि औरों के पौधे बड़े और हरे -भरे उग आये थे। वह युवा निराश हो चुका था। एक बर्ष बीत गए। सभी युवक अपने -अपने गमले के साथ राज दरबार में उपस्थित हुए। सब काफी प्रसन्न थे क्योंकि उनके गमले में पौधे हरे -भरे लहलहा रहे थे। सिर्फ वह युवा जिसके गमले में पौधा नहीं पनप पाया था ,खाली गमले के साथ उपस्थित था। सभी उसपर हंस रहे थे। राजा ने घोषणा की। उन्होंने उस युवा को ,जिसका गमला खाली था को अपना उत्तराधिकारी चुना। सभी अन्य हतप्रभ थे। राजा ने कहा -आप सबों को मैंने उबली हुए बीजें दी थी। फिर पौधा कैसे आ गया ? आप लोगों ने छलपूर्वक दूसरे बीज को गमले में उगाया जबकि यह नौजवान ने छल का सहारा नहीं लिया इसलिए मैं इन्हे अपना उत्तराधिकारी चुनता हूँ। सच्चे और ईमानदार आदमी हमेशा अपने जीवन में सफल होते हैं।

[२]नुक्ते के हेरफेर से। -यह एक सच्ची घटना है।एक पुलिस कप्तान चुनाव से पहले मीटिंग की। लॉ एंड आर्डर बरकार रखने के लिए तथा शांतिपूर्ण मतदान कराने हेतु बैठक बुलाई गई थी। जिले के अन्य आला अफसर तथा सभी पत्रकार भी उपस्थित थे। अपने ब्रीफिंग में कहते -कहते उन्होंने कहा की -आपका जिला बहुत चोट्टा जी [अहिन्दी भाषी थे ]]इसलिए क़ानून व्यवस्था ठीक रहेगा जी। अब तो नज़ारा ही बदल गया। सभी पत्रकारों ने हंगामा मचाना शुरू कर दिया। वे अपने आप को अपमानित महसूस करने लगे तथा मीटिंग का बहिस्कार करने की घोषणा कर दी। स्थिति की नाजुकता को भांपते हुए जिलाधिकारी ने कहा -आप लोग कृपया भ्रमित मत हों। दरअसल कप्तान साहब का कहने का तत्प्रय यह था की आपका जिला बहुत छोटा है। चूँकि ये अहिन्दी भाषी हैं इसलिए उच्चारण में चूक हो गयी कृपया इसे अन्यथा नहीं लिया जाये . मामला शांत हुआ और मीटिंग तब जाकर शांतिपूर्ण संपन्न हुआ।




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इकतीख तारीख

वह सुबह से ही मंदिर के अहाते में आकर बड़ी देर से बेहद उदास होकर बैठी थी ।लगता था कि वह भूखी भी है ।पुजारी जी ने उसे देखते ही पूछा- “माई,लगता है आज इकतीख तारीख है ।” “हाँ,पंडित जी ।” “तो तू,उदास क्यों होती है,आज का दिन यहीं गुज़ार,और यहीं खाना खा ।” इतना सुनते ही वह अतीत में पहुँच गई। पति के निधन के बाद मेहनत-मजदूरी करके उस औरत ने अपने दोनों बेटों को पाल-पोसकर, पढ़ा-लिखाकर इस क़ाबिल बनाया था,कि वे दोनों सरकारी नौकरी में और एक अच्छी पत्नी को पा सकें ।पर शादी के बाद दोनों भाइयों में नहीं बनी तो उन्होंने घर-मकान का बंटवारा कर लिया, पर कोई भी बेटा माँ की पूरी ज़िम्मेदारी लेने को तैयार नहीं था। अंत में लाचार होकर दोनों भाइयों ने पंद्रह-पंद्रह दिन के लिए माँ की जिम्मेदारी ले ली ।पर विडंबना कि जब महीना इकत्तीस दिन का होता था तो माँ को एक दिन मंदिर में जाकर गुज़ारा करना पड़ता था । “माई ,कहाँ खो गई?ये भोग तो खा,और आराम कर ।” पुजारी की आवाज़ सुनते ही वह वर्तमान में लौट आई ,और आँसू पौंछकर भोग लेकर खाने लगी। -प्रो.शरद नारायण खरे




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परमात्मा का स्वरुप

नचिकेता बाजश्रवा ऋषि के पुत्र थे। उन्होंने यमराज से तीन वर प्राप्त किया था। उन्होंने नचिकेता को ज्ञानोपदेश दिया था। इन दोनों के बीच संवाद पठनीय है। नचिकेता -किस तरह से होता है ब्रह्म का ज्ञान और दर्शन ?मनुष्य के शरीर में दो आँख ,दो नाक के छिद्र ,दो कान ,एक मुहं ,नाभि ब्रह्मरंध ,,गुदा ,एवं शिश्न के रूप में ११ दरवाजे वाले नगर की तरह है जो ब्रह्म की नगरी है। वे मनुष्य के ह्रदय में रहते हैं।इस रहस्य को जानकार जो ध्यान और चिंतन करता है,उसे किसी प्रकार का दुःख नहीं होता। और ऐसे लोग जन्म -मृत्यु के बंधन से मुक्त हो जाते हैं। प्रश्न -क्या आत्मा मरती या मारती है ?–जो लोग ऐसा मानते हैं दरअसल वे आत्मा को नहीं जानते और भटके हुए हैं। क्योंकि ना तो आत्मा मरती है और ना ही किसी को मार सकती है। प्रश्न -क्या ह्रदय में परमात्मा का वास होता है ?-मनुष्य का ह्रदय ब्रह्म को पाने का स्थान माना जाता है। उसका ह्रदय अगूंठे के माप का होता है अपने ह्रदय में भगवान् का वास मानने वाले दूसरों के ह्रदय में भी ब्रह्म इसी तरह विराजमान हैं। इसलिए दूसरों की बुराई या घृणा से दूर ही रहना श्रेष्यकर है। प्रश्न -क्या है आत्मा का स्वरुप ?-शरीर तो नाशवान है पर जीवात्मा का नाश नहीं होता। आत्मा का भोग -विलाश ,अनित्य ,और जड़ शरीर से कोई लेना -देना नहीं है। यह दोष रहित है। इसका ना तो कोई कारण है ,ना कार्य यानि इसका ना कोई जन्म होता है ,ना। मृत्यु। प्रश्न –आत्मा -परमात्मा के ज्ञान को नहीं जाननेवाले को कैसे फल भोगने पड़ते हैं ?–जिस तरह बारिश का पानी एक ही होता है ,और ऊंचाई से नीचे की ऒर का प्रवाह एक जगह नहीं रूक्ता ,कई प्रकार के रूप रंग और गंध में बदलता है उसी तरह एक ही परमात्मा से जन्म लेने वाले देव ,असुर ,और मनुष्य भगवान् को भी अलग -अलग स्वरुप में मानते और पूजा करते हैं। और बर्षा -जल की तरह ही सुर -असुर कई योनियों में भटकते रहते हैं। प्रश्न -आत्मा निकलने के बाद शरीर में क्या रह जाता है -?
आत्मा के शरीर छोड़ने के बाद उसके साथ प्राण और इन्द्रिय ज्ञान भी निकल जाता है। मृत शरीर में क्या बांकी रह जाता है ,यह तो दृश्टिगोचर नहीं होता लेकिन वह परब्रह्म उस शरीर में रह जाता है जो प्रत्येक चेतन और जड़ प्राणी में विद्यमान है प्रश्न -मृत्यु के बाद आत्मा को कौन सी योनियाँ मिलती हैं ?—अच्छे और बुरे कार्यों और शास्त्र ,शिक्षा ,गुरु संगति और व्यापार के माध्यम से देखी -सुनी बातों के आधार पर पाप -पुण्य होते हैं। इनके आधार पर ही आत्मा मनुष्य या पशु के रूप में नया जन्म प्राप्त करती है। जो लोग अधिक पाप करते हैं वे अन्य योनियों जैसे पेड़ -पौधों पहाड़ ,तिनकों में जन्म पाते हैं। यमदेव ने नचिकेता को ॐ को पततिक रूप में परब्रह्म का स्वरुप बताया। ओंकार ही परमात्मा का स्वरुप है।

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क्रोध की अग्नि

प्राचीन काल की बात है ,आदि शंकराचार्य और मंडान मिश्र के बीच सोलह दिनों तक शास्तार्थ चला। और इस शास्तार्थ की निर्णायक थी -भारती जो मंडान मिश्र की धर्म पत्नी थी। हार -जीत का निर्णय बांकी था की इसी बीच कुछ जरूरीकार्यवश भारती को बाहर जाना पड़ा ,जाने से पहले भारती ने दोनों विद्वानों के गले में एक -एक फूलों की माला डालते हुए कहा कि ये दोनों मालाएं ही मेरी अनुपस्थिति में हार और जीत की फैसला करेगी। जब भारती वापस लौटी तो उन्होंने फूल मालाओं को देखकर आदि शंकराचार्य को विजयी घोषित किया तथा मंडान मिश्रा को पराजित माना। यानी अपने ही पति को पराजित करार दिया। श्रोतागण हैरान थे उन्होंने भारती के सम्मुख अपनी जिज्ञासा रखी ,आखिर वे इस निर्णय पर कैसे पहुंची ? देवी भारती ने जवाब दिया -जब भी कोई विद्धान पराजित होने लगता तो वह अंदर ही अंदर क्रुद्ध होने लगता है। और क्रोधः की ताप से मेरे पति की माला सुख चुकी थी जबकि आदि शंकराचार्य की माला अब भी तरोताजा है। इससे साबित होता है कि शंकराचार्य विजयी हुए हैं।
विदुषी भारती का यह निर्णय का तरिका सुनकर सभी ने उनकी प्रशंसा की। क्रोध एक ऐसी ज्वाला है जो पहले हमारे विवेक को नष्ट कर देती है। और हम जीतते -जीतते भी हार जाते हैं। लाख अच्छाईया हों क्रोधित व्यक्ति अन्तः पराजित ही होता है। यह रिश्तों में दरार भी ला देता है। यह भी सच है कि परिस्थितिजन्य कारणों से क्रोध उतपन्न होता है और इस पर विजय प्राप्त करना कठिन होता है पर प्रयास करें तो धीरे- धीरे इसे काम तो किया ही जा सकता है। क्रोध के मूल करने को समझकर इसे सुधारने का प्रयास करें तो स्वतः क्रोध काम होना शुरू हो जाएगा। जीवन की सरसता के लिए क्रोध रूपी अग्नि को बुझाना ही पड़ता है।

जहीर कुरैशी ने क्या खूब लिखा है -क्रोध रोके रुका ही नहीं /मुट्ठियों में बंधा ही नहीं /कैसे मंज़िल पे पहुंचेगा ,आजतक जो चला ही नहीं /बाँटते -बाँटते कर्ण की गाँठ में कुछ बचा ही नहीं /जो लिपट न सकी पेड़ से /सच कहूं वो लता ही नहीं /ऋण सभी पर रहा सांस का /मरते दम तक चुका ही नहीं।




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बोध कथा

एक भिखारी सड़क किनारे बर्षों से भीख मांग रहा था। फिर एक समय आया और वह मर गया। वह राजा बनाना चाहता था। यह बड़ी बेतुकी बात थी ,भिखारी का सम्राट बनने का स्वप्न देखना ?वह चूँकि एक लम्बे अरसे से भीख मांग रहा था सो उस इलाके का वह मशहूर भिखारी हो गया था। पर राजा नहीं बन सका। फिर मौत तो आणि ही थी। मौत अमीरों को भी आती है ,भिखारी को भी। जब वह मर गया तो लोगों ने उसके लाश को उठवाकर फिंकवा दिया। गंदे चीथड़े ,,बर्तन -भांडे सब हटवा दिए। पूरी गन्दगी फैली थी। सबने मिलकर उस स्थल को साफ किया। उस जगह की मिटटी भी हटवानी शुरू कर दी। ताकि जमींन भी साफ़ हो जाये .जब मिटटी खोदी तो उपस्थित लोग हक्के- बक्के रह गए। भीड़ लग गई।
माज़रा यह था कि जिस जगह पर भिखारी बर्षों से बैठा करता था वहाँ नीचे एक बड़ा खज़ाना गड़ा था। जिसमे बहुमूल्य हीरे -जवाहरात थे ,सोने की अशर्फियाँ थी। सब कहने लगे ,-कैसा पागल भिखारी था ,जिंदगी भर भीख माँगता रहा पर उसे पता तक नहीं था कि जिस जगह पर वह बैठकर भीख मांग रहा है उसके नीचे एक बड़ा खज़ाना है। सचमुच वह बड़ा अभागा था। इन बेशकीमती रत्नो से राजा बन सकता था पर उसने जमींन नहीं खोदी और जीवन भर पाई-पाई भीख मांगता रहा। इसे ही तो नियति का खेल कहते हैं।प्रेम का खज़ाना तो अंदर है। पर जिसे देखो वह कुछ मांग रहा है ,प्रेम मांग रहा है। प्रेम का खज़ाना खोदते -खोदते तो ही परमेश्वर के ख़ज़ाने तक पहुँच सकता है। इस गूढ़ रहस्य को समझना होगा। जिनके पास खुद ही प्रेम नहीं हो वह दूसरों को क्या प्रेम देगा ?

सच कहा है किसी कवि ने -प्रेम अलौकिक है /प्रेम दिव्य है /प्रेम आत्मा का है रंजन /प्रेम अहं से प्रे अवतरित प्रेम स्वयं का है विसर्जन।




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आत्मग्लानि

एक समय की बात है कि एक डाकू गुरु नानकदेव के पास आया और उनकी चरणों में गिड़ पड़ा। उसने आर्त स्वर में कहा -,गुरुदेव मैं अब इस डाकू की जिंदगी से तंग आ व्हुका हूँ। इस जीवन से छुटकारा चाहता हूँ ,कृपया मुझे सही मार्गदर्शन बताइये। गुरु नानक देव ने कहा -‘अगर तुम सचमुच अच्छा इंसान बनना चाहते हो तो त सारे बुरे कर्मों को छोड़ दो। ‘कुछ दिनों बाद वह फिर आया और कहा ,’नानक जी ,चोरी करना और समस्त बुरे कार्य को छोड़ नहीं पा रहा हूँ। नानकजी ने कहा -तुम चोरी करने और खराब करने के बाद तुम सबके सामने अपने कार्यों का वर्णन करो। यह कार्या तो अत्यंत ही दुरूहपूर्ण था। अपने खराब कार्यों को लोगों के समक्ष कहने में उसे बहुत तकलीफ होती थी लिहाज़ा उसे अपने खराब कार्यों से स्वयं ही घृणा होने लगी। एक दिन वह फिर नानकडोजी के पास पहुंचा और कहा -उसे अपने कुकृत्यों पर आत्मग्लानि होती थी इसलिए उसने समस्त गलत कार्यों को हमेशा के लिए छोड़ दिया

[२] राजकुमार -कुछ समय पूर्व एक राजा कुशलता पूर्वक शासन कर रहा था .उसके राज्य में चहुँ तरफ शान्ति का माहौल था। राजा का एक लड़का था जो देखने में अति सुन्दर ,बलशाली ,और वीर प्रतीत होता था पर वास्तव में उसकी बुद्धि बहुत कमज़ोर थी। उसकी बुद्धि बढ़ाने के लिए राजा ने कई उपाय किये ,यज्ञ ,पूजा करवाए परन्तु कोई लाभ नहीं हुआ। आखिरकार राजा ने उसे एक ज्ञानी महात्मा के पास भेज दिया। कुछ बर्षों बाद राजा ने राजकुमार की परीक्षा ली। राजा ने अपनी मुट्ठी में एक अंगूठी रख ली और राजकुमार से पूछा -कि उनके मुट्ठी में क्या है ? राजकुमार कुछ सोचने के बाद कहा -,राजन ,आपके मुट्ठी में कोई ऐसी वस्तु है जिसका आकार गोल तथा चक्की के पाट जैसी है। राजा उत्तर सुनकर बहुत निराश हुए चक्की जैसी वस्तु मुट्ठी में कैसे समा सकती है ?इसलिए इंसान को किताबी ज्ञान तो दिया जा सकता है पर व्यवारहिक ज्ञान तो स्वयं आता है।




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गुरु

हमारे जीवन में गुरु का स्थान हमेशा उच्च का रहा है। एक समय कि बात है एक महात्मा रास्ता भटक गए,रात हो चली थी। इतने में एक चोर से मुलाक़ात महात्मा की हो गई। उसके काफी आग्रह करने पर महात्मा जी उसके घर चले गए। चोर रोज रात में चोरी करने निकल जाता और सुबह होने के पहले खाली हाथ लौट जाता। फिर भी उसके चेहरे पर तनिक भी निराशा के भाव नहीं थे। महात्मा जी के पूछने पर बड़े ही संयम से कहता -आज भी कुछ हाथ नहीं लगा कोई बात नहीं ,कल फिर प्रयास करूंगा .इस प्रकार महीनो बीत गए। हर रोज यही कहता। महात्मा ने अपने शिष्य से कहा कि वह चोर उनका पहला गुरु है। दूसरे गुरु के बारे में उन्होंने कहा कि वह एक कुत्ता है। शिष्य को घोर आष्चर्य हुआ। कुत्ता और गुरु ?यह कैसे संभव है। तब महात्मा ने किस्सा सुनाया। एक कुत्ता बहुत ही प्यासा था। वह तालाब के किनारे जाता और चिल्लाते हुए पीछे लौट जाता। दरअसल कुत्ता पानी में अपनी परछाई देखकर डर जाता। इधर प्यास के मारे उसका बुरा हाल था। कुछ देर बाद उसने पानी में छलांग लगा दी। डर ख़त्म हो चुका था। उसने भरपेट पानी पीया |महात्मा ने कहा कि यह उनका दूसरा गुरु है। एक का आशावादिता और संयम और दूसरे का डर से अदम्य सामना। सच्चे लगन से कोई भी काम करने पर फल अव श्य मिलता है। पुरानी कहावत है कि काक चेस्टा ,बको ध्यानम ,श्वान और निंद्रा —-अर्थात कौए की तरह चेश्टा ,बगुले की तरह ध्यान ,कुत्ते की तरह नींद ,गृह त्यागी और अल्पहारी यानी बिद्यार्थी के पांच लक्षण है। सच्चे मनोभाव से किया गया कार्य शुभ फलदायी होता है।




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