एक सवाल था दिल में, जवाब चाहती हूँ!
उलझी हूँ थोड़ी, एक आस चाहती हूँ!
की क्या हो हर बार, बार-बार जो तुम मुझे निराश करते रहो,
हर आस को मेरी तारतार करते रहो!
मैं फिर तुम्हारे एक इशारे पे दौड़ी चली आऊँ,
तुम कहो तो रोयुं, तुम कहो तो मुस्काऊँ!
की क्या हो जो तुम हर बार मुझे गिनाते रहो गलतिया मेरी,
सुनाते रहो बातें जो तीर सी हो तीखी,
मैं फिर भी हर बार वो तीखा स्वाद भूल जाऊं,
तुम दो एक आवाज़, मैं दौड़ी चली आऊँ!
क्या हो, जो हर बार तुम वजह दो मुझे दूर जाने की,
कोई कोशिश न छोड़ो मुझे रुलाने की,
मैं फिर भी हर बार तुम्हारी तरफ खींची आऊँ,
रब दे ज़िन्दगी जितनी भी,
उसकी हर सांस तेरे नाम लिख जाऊँ,
और फिर एक रोज,
आखिर मान लो हार तुम भी,
भूला के पिछली बातों को तुम मेरे पास लौट आओ!
और, मैं लेलू बदला तुमसे उस वक़्त!
हमेशा के लिए तुम्हे छोड़ कहीं दूर चली जाऊँ,
जहाँ से न खबर मिले मेरे आने की,
का अक्स मिले कोई,
वो दुनिया जहाँ से कोई वापस नहीं आता!
क्या हो?!
तुम मुझे पल-पल मारने की कोशिश करो,
और हर कोशिश का बदले मैं तुम्हें जीते जी मार जाऊँ!
बस एक सवाल था मेरे दिल में,
इसका जवाब चाहती थी!
क्या हो?!
जो एक रोज, बिन बताये ऐसा कर जाऊं!!
क्या हो?!


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